बीज क्या है । बीज और अनाज में अंतर । बीज के प्रकार

बीज क्या है, बीज और अनाज में अंतर तथा बीज के प्रकार लिखिए

बीज क्या है what is seed in hindi

( क ) पौधे का एक भाग ( A part of plant ) :- वनस्पति विज्ञान में बीज का तात्पर्य एक परिपक्व बीजाण्ड ( Ripened ovule ) से लगाया जाता है, जिसमें उपस्थित भ्रूण ( Embryo ), भ्रूणपोष ( Endosperm ) अथवा बीजपत्रों ( Cotyledons ) में उपस्थित भोजन को लेकर प्रारम्भिक वृद्धि करता है और नए पौधों को जन्म देता है।

लेकिन बहुत सी फसलों के बीज केवल परिपक्व बीजाण्ड नहीं होते, उनमें कुछ अन्य पादप अंग भी जुड़े रहते हैं। जैसे - गेहूं, धान, मक्का, सूरजमुखी आदि। ये बीज वानस्पतिक दृष्टि से बीज न होकर एकबीजी फल है, जिनमें बीजावरण तथा फलभित्ति ( pericarp ) परस्पर आपस में जुड़े रहते हैं।

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( ख ) प्रवर्धन सामग्री ( sowing material ) :- कुछ पौधों में अगली फसल का उत्पादन बीज के अलावा पौधों के अन्य वानस्पतिक भागों जड, तना व पत्तियों आदि से भी किया जाता है। जैसे - पौद, कंद, शक्ल कंद, प्रकंद, जड़े, कलमें व अन्य प्रवर्धन सामग्री ( sowing material )। 

अतः बीज प्रौद्योगिकी में बीज का तात्पर्य लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न ( sexually reproduction ) बीज के साथ-साथ फल, तना, जड व अन्य प्रवर्धन सामग्री ( propagating material ) से है। बीज अधिनियम, 1966 में बीज को इसी प्रकार परिभाषित किया गया है।

इस प्रकार बीज एक छोटी जीवित रचना है, जिसमें भ्रूणीय पौधा ( embryonic plant ) ऊतकों ( tissues ) की विभिन्न परतों से ढका हुआ सुषुप्त ( dormant ) अवस्था में रहता है, जो अनुकूल वातावरणीय परिस्थितियों - नमी, ताप, वायु व प्रकाश की सुलभता और मृदा के संपर्क से नए पौधे में विकसित हो जाता है। वस्तुतः बीज एक सूक्ष्म पौधा ही है।

बीज और अनाज में अंतर difference between Seed and grain

अनाज और बीज दोनों के उपयोग क्षेत्र अलग - अलग हो जाते हैं। इसलिए दोनों के बीच अंतर बन जाते हैं। अनाज और बीज में बीच अंतर

•  वर्णन ( description ) - बीज में लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न बीज के साथ-साथ पौधों के भाग जैसे - तना, पत्ती, जड़ भी सम्मिलित होते हैं, जबकि दाने ( अनाज ) केवल खाद्यान्नों ( cereals and millets ) के लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न बीज ही होते हैं।

•  उत्पादन ( production ) - अनाज के लिए उगाई जाने वाली फसलों से अधिक उत्पादन प्राप्त करना ही प्रमुख लक्ष्य होता है अतः इसका बीज के गुणों से कोई संबंध नहीं होता है। जबकि बीज उत्पादन के लिए किसी स्वीकृत या मान्य स्रोतों से आधार या प्रजनक बीज प्राप्त किया जाता है और बीज फसल को उगाने और कटाई के बाद संसाधन व भंडारण आदि क्रियाओं के दौरान प्रदूषण के सभी संभव स्रोतों और कारकों को यथासंभव दूर रखने का प्रयत्न किया जाता है। उत्पादित बीजों का प्रमाणीकरण किया जाता है एवं उन पर लेबिल लगाए जाते हैं।

•  गुणवत्ता ( quality ) - अनाज के लिए उसकी भौतिक एवं अनुवांशिक शुद्धता, अंकुरण प्रतिशत, कीट क्षति आदि के विषय में कोई ध्यान नहीं दिया जाता है, इसमें तो केवल पौष्टिक ही सबसे उत्तम माना जाता है। जबकि बीज सबसे अच्छा वही माना जाता है, जिसकी अनुवांशिक शुद्धता शत-प्रतिशत हो, अंकुरण क्षमता अच्छी हो, तथा उसकी भौतिक शुद्धता भी अच्छी हो। कीड़ों और रोगों से मुक्त हो तथा उसमें जीवन शक्ति व ओज भरपूर मात्रा में हो।

•  उपचार ( treatment ) - बीज का उपयोग बोने के लिए किया जाता है, खाने के लिए नहीं। अतः उसे ऐसे विषाक्त रसायनों से उपचारित किया जाता है, जो बीज को नष्ट करने वाले कीड़ों, बीमारियों तथा जीव - जंतुओं से बीज को बचाते हैं। जबकि अनाज का उपयोग खाने के लिए किया जाता है।

इसलिए उसको सुरक्षित रखने के लिए ऐसे रसायनों का प्रयोग किया जाता है, जो कीड़ों और रोगों से तो बीज को बचा सके लेकिन मनुष्य पर इनका कोई प्रभाव न पड़े। अतः बीज का उपयोग अनाज के रूप में नहीं किया जा सकता है, जबकि अनाज का उपयोग बीज के लिए किया जा सकता है।

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बीज के प्रकार हिन्दी में types of seeds in hindi

बीजों को कई प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है :-

( क ) जनन विधि के आधार पर बीजों का वर्गीकरण ( method of reproduction )

प्रजनन की विधियों के आधार पर बीजों के दो प्रकार होते हैं - 

•  लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न बीज ( sexually reproduced seeds ) - इस श्रेणी में बीज की सामान्य परिभाषा के अनुसार परिभाषित बीज ही आते हैं, जो निषेचन के पश्चात भ्रूण के विकास से उत्पन्न होते हैं।

•  अलैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न बीज ( asexually reproduced seeds ) - कभी-कभी अगली फसल उगाने के लिए बीज के अलावा अन्य पादप सामग्री ( वानस्पतिक भाग ) जड़, तना, पत्ती आदि प्रयोग में लाई जाती है, तो वह बीज ही कहलाती है जैसे - 

( i ) भूमिगत तने ( underground stems )

प्रकंद ( rhizome ) - अदरक, हल्दी, केली आदि।

कंद ( Tuber ) - आलू

घनकंद ( corm ) - अरवी, जिमीकंद आदि।

शल्क कंद ( bulb ) - प्याज, लहसुन आती।

( ii ) अध्र्दवायवीय तने ( sub - aerial stems )

उपरिभूस्तारी - दूब, घास, ब्राह्मी बूटी आदि।

अन्त:भूस्तारी - पोदीना, गुलदावदी आदि।

भूस्तारिका - जलकुंभी, सिंघाड़ा आदि

भूस्तारी - स्ट्राबेरी

( iii ) पत्तियां ( leaves ) 

दर्दमार

बिगोनिया आदि।

( iv ) पत्र प्रकलिका ( bulbils ) 

लहसुन, रतालू आदि।

( v ) असंग जनित बीज 

आम, तम्बाकू आदि।

( vi ) कृत्रिम प्रवर्धन ( artificial propagation )

जड़ कलमें ( root cutting ) - नींबू, संतरा आदि।

तना कलमें ( stem cutting ) - गन्ना , शकरकंद आदि।

चश्मा चढाना ( budding ) - गुलाब

कलम बंधन ( grafting ) - आम, लीची आदि।

दाब लगाना ( layering ) - नींबू, अंगूर, गुलाब आदि।

गूटी ( gootee ) - रबड, नींबू आदि।

( ख ) बीजों के आयुकाल के आधार पर ( longevity of seeds ) 

कुछ बीजों को यदि हम कटाई के तुरंत बाद बोते हैं तो उनमें अंकुरण हो जाता है,‌ लेकिन कुछ जातियों के बीच उचित नमी, ताप व वायु के मिलने पर भी परिपक्वता के तुरंत बाद नहीं उगते। ऐसा प्रसुप्ति ( dormancy ) के कारण होता है। ऐसे बीजों में कुछ समय के लिए विश्राम काल ( rest period ) रहता है, ‌ लेकिन कुछ बीज तो बरसों जमीन में पड़ने के बाद भी जीवनक्षम ( viable ) बने रहते हैं।

एवर्ट ( Avert ), 1908 ने बीजों को आयुकाल के आधार पर तीन वर्गों में विभाजित किया है :-

•  अल्पायुजीवी बीज ( microbiotic seeds ) - इस वर्ग के अंतर्गत वे बीज आते हैं जिनकी आयु लगभग 3 वर्ष तक होती है, उदाहरण के लिए मालवेसीलेग्युमिनेसी कुल के पौधों के बीज।

•  मध्यम आयुजीवी बीज ( mesobiotic seeds ) - इस वर्ग के अंतर्गत वे बीज आते हैं जिनकी आयु लगभग 3 से 15 वर्ष तक होती है, अधिकतर वे बीज इसी श्रेणी में आते हैं।

•  दीर्घायुजीवी बीज ( macrobiotic seeds ) - इस वर्ग के अंतर्गत वे बीज आते हैं जिनकी आयु लगभग 15 से 100 वर्ष तक होती है और कभी-कभी इससे भी अधिक होती है।

( ग ) भंडारण क्षमता ( storability ) के आधार पर बीजों का वर्गीकरण 

उचित परिस्थितियों में अनेक जातियों के बीजों का 50 से 100 वर्ष तक सुरक्षित भंडारण आसानी से किया जा सकता है। 

राॅबर्टस ( Roberts ), 1973 ने बीजों को उनकी भंडारण क्षमता के आधार पर दो समूहों ( सरल व अडियल बीज ) में बांटा है।

• सरल बीज ( orthodox seeds ) - इस वर्ग के बीजों में उपस्थित नमी अंश को उनकी जीवन क्षमता में कमी किए बिना 5% अथवा इससे भी कम किया जा सकता है, साथ ही ये बीज अवशीतन ( freezing ) भी सहन कर सकते हैं। जिससे उन्हें आसानी से लंबे समय तक भंडारित किया जा सकता है। अधिकतर फसल वाले पौधे इस वर्ग में आते हैं।

( i ) सत्य सरल बीज ( true orthodox seeds ) - ये बीज अवशीतन तापमान पर लंबे समय तक भंडारित किये जा सकते हैं। अनेक फल वृक्षों एवं वन वृक्षों के बीज इस वर्ग के अंतर्गत आते हैं, जैसे - जंगली अखरोट, चीड़, चैरी एवं अलूचा आदि।

( ii ) उप - सरल बीज ( sub - orthodox seeds ) - ये बीज भी उन्हीं दशाओं में भंडारित किए जा सकते हैं, जिनमें सत्य सरल बीज का भंडारण किया जाता है, लेकिन अपेक्षाकृत थोड़ी अवधि के लिए। इसका कारण इन बीजों में पाया जाने वाला अधिक वसा तत्व ( अखरोट व कुछ चीड़ वृक्ष ) एवं फलभित्ति व बीज चोल का पतला होना ( चिनार, सरपत ) हो सकता है।

•  मध्यवर्ती बीज ( intermediate seeds ) - ये बीज भी सरल बीज वाली दशाओं तक सुखाये जा सकते हैं ( 12-15% नमी स्तर ‌), लेकिन निम्न तापमान के प्रति संवेदनशील होते हैं। जीवन क्षमता कुछ वर्ष तक ही रहती है। इस वर्ग में कहवा के बीज आते हैं।

•  अडियल बीज ( recalcitrant seeds ) - इस वर्ग के बीजों में नमी स्तर 12-13 प्रतिशत से नीचे लाने पर उनकी जीवन क्षमता में बड़ी तेजी से कमी आती है और ये अवशीतन भी सहन नहीं कर सकते हैं, जिससे इनके भंडारण में काफी कठिनाई आती है और ये बीज अल्पायु होते हैं। इन बीजों के उदाहरण के लिए अनेक वन वृक्ष व फल वृक्ष के बीज जैसे - कोको, कहवा, नींबू, आम, कटहल आदि हैं।

( i ) शीतोष्ण अड़ियल बीज ( temperate recalcitrant seeds ) - इन बीजों को सुखाया नहीं जा सकता है, लेकिन इन बीजों को अवशीतन या उससे निम्न तापमान पर भंडारित कर सकते हैं। इसके उदाहरण के लिए अखरोट व सिंदूर के बीज हैं।

( ii ) उष्ण अड़ियल बीज ( tropical recalcitrant seeds ) - इन बीजों को 10-15° से. से नीचे तापमान पर बहुत थोड़े समय रखने पर ही इनकी जीवन क्षमता समाप्त हो जाती है। इन बीजों का जीवनकाल वर्षों में नहीं, बल्कि महीनों में होता है।

( घ ) पीढ़ी पद्धति के आधार पर बीजों का वर्गीकरण ( generation system )

अंतर्राष्ट्रीय शस्य उन्नयन संघ ( international crop improvement association ) द्वारा सन् 1946 में चारा वाली फसलों के लिए शुद्ध बीज के चार वर्ग निर्धारित किए गए, जो बाद में ( 1968 ) दाने वाली फसलों के लिए भी लागू हुए। वास्तव में ये बीज के वर्धन ( multiplication ) की विभिन्न अवस्थाएं हैं, जिनमें उत्तरोत्तर पीढ़ी में बीज की भौतिक एवं अनुवांशिक शुद्धता में कमी आती जाती है -

( i ) प्रजनक बीज ( breeder seed ) - यह वह बीज होते हैं, जिनके उत्पादन का नियंत्रण संबंधित पादप प्रजनकों द्वारा पादप प्रजनन से संबंधित कार्यक्रम के अंतर्गत किया जाता है। प्रजनक बीज की गुणवत्ता की देखरेख प्रजनक बीज नियंत्रण दल द्वारा की जाती है, जो एक प्रमाण पत्र प्रदान करती है कि इस बीज की गुणवत्ता की जांच उसके द्वारा की गई है और संतोषजनक है।

अतः यह बीज शुद्ध होता है। यही बीज आधार बीज के वर्धन का स्रोत है। इस बीज को उत्पादन करने वाली संस्था द्वारा सुनहरी पीला प्रमाणपत्र प्रदान किया जाता है। कई बार प्रजनक बीज बहुत ही कम मात्रा में प्राप्त होते हैं, तो इससे वर्धन करके प्रजनक बीज तैयार किया जाता है। तो इसे नाभिकीय बीज ( nucleus seed ) कहा जाता है अर्थात् यह प्रजनक बीज का ही एक प्रकार होता है।

( ii ) आधार बीज ( foundation seed ) - प्रजनक बीज की मात्रा बढ़ाने के लिए जो बीज किसी अधिकृत बीज प्रमाणीकरण संस्था की देखरेख में, राजकीय कृषि फार्मों, अनुसंधान केंद्रों व सुयोग्य उत्पादकों द्वारा तैयार किया जाता है, आधार बीज कहलाता है। 

कभी-कभी यह आधार बीज को ही बढ़ाने के लिए प्रयुक्त होता है। यह प्रजनक बीज जितना शुद्ध नहीं होता है, इस वर्ग के बीज को प्रमाणीकरण संस्था द्वारा सफेद रंग का प्रमाण पत्र प्रदान किया जाता है।

( iii ) पंजीकृत बीज ( registered seed ) - इस बीज का उत्पादन आधार बीज अथवा पंजीकृत बीज से ही, किसी बीज प्रमाणीकरण संस्था की देखरेख में किया जाता है, जिससे बीज की गुणवत्ता संतोषजनक बनी रहती है। 

कुछ संस्थाओं के द्वारा कुछ फसलों के लिए इसका प्रयोग प्रमाणित बीज उत्पादन के लिए किया जाता है। अधिकतर आधार बीज ही प्रमाणित बीज उत्पादन के लिए प्रयुक्त होते हैं। अतः वहां बीज का यह वर्ग नहीं पाया जाता है। हमारे देश में बीज का यह वर्ग प्रचलन में नहीं है।

( iv ) प्रमाणित बीज ( certified seed ) - यह बीज आधार बीज, पंजीकृत बीज अथवा स्वयं प्रमाणित बीज की संतति होता है। इसका उत्पादन बीज प्रमाणीकरण संस्था की देखरेख में राजकीय कृषि फार्मों अथवा व्यक्तिगत उत्पादकों द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप किया जाता है, जिससे अनुवंशिक शुद्धता व गुणवत्ता बनी रहे।

इस वर्ग के बीज को नीले रंग का प्रमाणपत्र दिया जाता है। कभी-कभी बीज का उत्पादन स्वयं किसानों द्वारा ( किसी भी प्रमाणीकरण संस्था की देखरेख के बिना ) निश्चित मापदण्डों को अपनाते हुए किया जाता है, तो इसे प्रमाणीकरण संस्था का प्रमाणपत्र प्राप्त नहीं हो पाता, तो यह बीज " सत्य अंकित बीज ( truthfully labelled seed ) " कहलाते हैं। यह बीज प्रमाणित बीज जितने शुद्ध नहीं होते हैं।
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