अधिक उत्पादन पाने के लिए तुर अथवा अरहर ( Redgram or pigeon pea in hindi ) की उन्नत खेती कैसे करें ?

अधिक उत्पादन पाने के लिए तुर अथवा अरहर ( Redgram or pigeon pea in hindi ) की उन्नत खेती कैसे करें ?


वानस्पतिक वर्गीकरण ( Botanical classification )


वानस्पतिक नाम - कैजेनस कजान ( Cajanus cajan L. Millsp )

कुल ( Family ) - फेबेएसी ( Fabaceae )

गुणसूत्र संख्या - 2n = 22

अरहर की समस्त कृषित सजातियों को लंबाई, स्वभाव, परिपक्वता अवधि फलियों के आकार एवं बीज के रंग के आधार पर दो वर्गों में बांटा जाता है।

1. Cajanas cajan var. bicolour

इस वर्ग में लम्बी अवधि वाली प्रजातियां जिनके पौधे सर्वदा लम्बे झाड़ीदार होते हैं, आती है। इन प्रजातियों के फूल पीले अथवा बैगनी रंग के होते हैं। फलियों का रंग गाढ़ा तथा फलियों में दानों की संख्या चार से पांच तक होती है।

2. Cajanas cajan var. flavus

इस वर्ग में शीघ्र परिपक्वता अवधि वाली छोटे ढ़ांचे वाली प्रजातियां आती है। इस वर्ग के पौधों के फूलों का रंग सर्वदा पीला तथा फलियां सपाट होती हैं। फलियों में दानों की संख्या 2 से 3 होती है।


अधिक उत्पादन पाने के लिए तुर अथवा अरहर ( Redgram or pigeon pea in hindi ) की उन्नत खेती कैसे करें ?



अरहर का महत्व एवं उपयोग

उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों में अरहर की दाल सबसे अधिक प्रचलित है। वहां के लोग उसको चावल के साथ खाते है। इसकी चूरी को जानवरों को खिलाया जाता है। अरहर की फसल की हरी पत्तियों को चारे के रूप में पशुओं को खिलाया जाता है और पकी फसल से दाल के अलावा दो अन्य महत्वपूर्ण पदार्थ पत्तियों का भूसा, लकड़ी प्राप्त होती है।

अरहर की फसल की सूखी लकड़ियों का प्रयोग कई प्रकार से किया जाता है। इसकी लकड़ियों से टोकरी, छप्पर, मकान की छत, ढक्कन आदि बनाए जाते हैं। इसका प्रयोग मृदा क्षरण ( soil erosion ) रोकने के लिए भी किया जाता है।

खेतों में अरहर की फसल उगाने से मृदा की उर्वरा शक्ति में अत्यधिक वृद्धि होती है, क्योंकि पौधों की पत्तियां झड़कर भूमि पर गिर जाती हैं और मिट्टी में मिल जाती है तथा बाद में सडकर खाद का काम करती हैं। अरहर की जड़ें भूमि में अधिक गहराई तक वृद्धि करती है, जिसके कारण मृदा में वायु का आयतन बराबर बना रहता है तथा जड़ों में उपस्थित राइजोबियम बैक्टीरिया मृदा में नत्रजन की वृद्धि करता है। वायु द्वारा मृदा क्षरण रोकने में वायु प्रतिरोधक के रूप में भी इसे काम में लाते हैं। लाख के कीड़े पालने में भी अरहर का प्रयोग करते हैं।

अरहर का वितरण एवं क्षेत्रफल

अरहर विश्व के सभी उष्ण व उपोष्णण क्षेत्रों में विस्तृत रूप से उगाई जाती है। इसकी खेती करने वाले मुख्य देश अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, इण्डोनेशिया, वेस्टइंडीज तथा भारत आदि है। विश्व के विभिन्न देशों में अरहर की खेती करने वाले देशों में भारत का प्रथम स्थान है। अरहर का पूरा क्षेत्रफल हमारे देश में दलहनी फसलों के पूर्ण क्षेत्रफल का लगभग 12% है, परन्तु उत्पादन, कुल दलहन उत्पादन का 17 - 18% है। 

क्षेत्रफल तथा उत्पादन की दृष्टि से दालों में चने के बाद अरहर का दूसरा स्थान है। भारत के लगभग सभी प्रांतों में अरहर की खेती की जाती है। भारत में अरहर का सबसे अधिक क्षेत्रफल महाराष्ट्र राज्य में है। केवल उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में भारत के कुल उत्पादन का 80% भाग उगाया जाता है।

उत्तर प्रदेश में सन् 2010-11 में अरहर का कुल क्षेत्रफल 3.4 लाख हेक्टेयर और कुल उत्पादन 3.1 लाख टन था। सबसे अधिक क्षेत्रफल जालौन, हमीरपुर, कानपुर, गाजीपुर, प्रतापगढ़ आदि जिलों में था।

अरहर की फसल के लिए उपयुक्त जलवायु

अरहर की खेती आर्द्र तथा शुष्क दोनों प्रकार के गर्म इलाकों मे आसानी से की जा सकती है। लेकिन शुष्क भागों में इसे सिंचाई की आवश्यकता होती है। फसल की प्रारंभिक अवस्था में पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए गर्म-तर अर्थात नम जलवायु की आवश्यकता होती है। अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्र अरहर की खेती के लिए उत्तम नहीं होते हैं, क्योंकि अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में फसल को फ्यूसेरियम विल्ट ( उकठा ) का प्रकोप अधिक होता है तथा राइजोबियम जीवाणुओं की क्रियाशीलता धीमी रहती है। परन्तु 75 से 100 सेंमी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में अरहर की खेती आसानी से जा सकती है।

अरहर के पौधों में फूल आते समय तक फली और दाने बनते समय शुष्क मौसम और तेज धूप की आवश्यकता होती है। पाले का फसल पर बहुत हानिकारक प्रभाव पड़ता है। इसलिए उत्तरी भारत के अधिकांश स्थानों पर पाला पड़ने की संभावना होने के कारण ही अरहर की फसल नहीं उगाई जाती है। फसल के पकने के समय उच्च तापमान की आवश्यकता होती है, और इस समय 90°F तापक्रम सबसे उत्तम है। अत्यधिक उच्च तापमान की दशा में भी फसल को नुकसान पहुंचता है।

अरहर की खेती के लिए उपयुक्त भूमि

अरहर की फसल लगभग सभी प्रकार की भूमियों में उगाई जा सकती है। लेकिन यह फसल मुख्यत: हल्की नम भूमि में अच्छी वृद्धि करती है। अरहर की फसल से अधिक पैदावार लेने के लिए यह आवश्यक है कि ऐसी दोमट मिट्टी चुनी जाए जहां पानी न ठहरता हो, जो गहरी हो और जिसका pH मान होता उदासीन हो। गहरी भूमि जिसमें पानी को सोखने की सकती हो, अरहर की जड़ की वृद्धि में सहायक होती है और उसकी पानी संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करती है।

कुछ स्थानों पर अरहर की फसल कंकरीली मृदा में भी उगाई जाती है, परन्तु कंकरीली मृदा में अच्छी उपज प्राप्त नहीं होती है। अरहर की अच्छी उपज लेने के लिए मृदा में निम्न गुणों का होना अति आवश्यक है -

1. मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम की मात्रा होनी चाहिए।

2. मृदा में जल-निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए। अतः खेतों में कहीं पर पानी ठहरता न हो।

3. मृदा की जल-धारण क्षमता अच्छी होनी चाहिए।

यदि मृदा में ये तीनों गुण हो तो, अरहर की फसल से अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है।

अरहर की उन्नतशील जातियां

देश के विभिन्न क्षेत्रों में वहां की जलवायु एवं मृदा के अनुसार अरहर की भिन्न-भिन्न प्रकार की जातियां उगाई जाती हैं। इसलिए अरहर की विभिन्न प्रकार की जातियां उपलब्ध हैं।

किस्म का नाम > पकने की अवधि > उपज (Q/ha)

1. प्रभात > 110 दिन > 12-15 (Q/ha)

2. UPAS-120 > 120 दिन > 16-20 (Q/ha)

3. पूसा अगेती ( AS 5 ) > 160-170 दिन > 15-20 (Q/ha)

4. टाइप 21 > 150-160 दिन >  15-20 (Q/ha)

5. टाइप 7 > 170 दिन > 16-30 (Q/ha)

6. शारदा  ( AS 3 ) > 145 दिन > 15-20 (Q/ha)

7. मुक्ता  ( R 60 ) > 180-190 दिन > 15-20 (Q/ha)

8. लक्ष्मी > 225 दिन > 15-20 (Q/ha)

9. बहार > 265 दिन > 20-25 (Q/ha)

10. बसंत ( No. 1234 ) > 270 दिन > 20-25 (Q/ha)

11. ग्वालियर 3 > 240 दिन > 20-25 (Q/ha)

12. एन. पी. ( डब्ल्यू. आर. ) 15 > 250 दिन > 20-25 (Q/ha)

13. ICPH-8 > 115-170 दिन > 14.22-28.51 (Q/ha)

14. ICPL-87119 > 170-180 दिन > 30 (Q/ha)

15. ICPL-151 > 150-160 दिन > 18-20 (Q/ha)

16. ICPH-2673 > 150-160 दिन > 20-25 (Q/ha)

17. S-20 > 180-190 दिन > 25 (Q/ha)

18. PPH-4 > 145 दिन > 18-20 (Q/ha)

19. पूसा 2002 > 143 दिन > 17.1 (Q/ha)

20. पूसा 2001 > 143 दिन > 20 (Q/ha)

21. मालवीय ( MA-6 ) > 258-260 दिन > 25-28 (Q/ha)

22. पूसा 992 > 145 दिन > 16-17 (Q/ha)

23. आशा ( ICPL 87119 ) > 160-170 दिन > 16-18 (Q/ha)

24. AL 15 > 135 दिन > 12-15 (Q/ha)

अरहर की फसल के लिए भूमि की तैयारी करना

ग्रीष्म ऋतु में रबी की फसल कटने के बाद एक गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2-3 जुताईयां हैरो या देशी हल से करते हैं। मिश्रित फसल के रूप में उगाने पर, साथी फसल ज्वार, बाजरा आदि के अनुसार ही खेत की तैयारी करते हैं। मिट्टी को भुरभुरा बनाने व मृदा नमी संरक्षण के लिए जुताई के बाद एक बार पाटा या पटेला चलाना आवश्यक है। आखिरी जुताई करने पर 5 प्रतिशत बी.एच.सी. को 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मृदा में छिड़ककर मिला देना चाहिए। इससे मृदा में रहने वाले कीट पतंगों, दीमक आदि की रोकथाम हो जाती हैं।

बीज की मात्रा और बीजोपचार

हमें सदैव प्रमाणित बीजों को ही बोना चाहिए। बीजों को बोने से पहले 3 ग्राम कैप्टान या 3 ग्राम थीराम प्रति 1 किलो बीज के हिसाब से बीजों को उपचारित करके बोना चाहिए। जब अरहर की फसल को किसी अन्य फसल के साथ मिश्रित रूप में बोया जाता है तो 2 से 8 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से बोया जाता है। अरहर की अकेली फसल में 12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज पर्याप्त होता है।

अरहर की फसल का बुवाई का समय

फसल की बुवाई अगेती करना अत्यंत लाभदायक रहता है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो उन क्षेत्रों में 1 जून से 15 जून तक फसल की बुवाई कर देनी चाहिए। वर्षा पर निर्भर रहने वाले क्षेत्रों में अरहर की बुवाई जुलाई के प्रथम सप्ताह में ही अधिकतर वर्षा होने पर करते हैं। बुवाई के समय का प्रभाव उपज पर सीधा पड़ता है। जुलाई के प्रथम सप्ताह के बाद में बुवाई करने पर उपज में भारी गिरावट आ जाती है।

बोने की विधि

बुवाई की विधि क्षेत्रीय प्रचलन के अनुसार ब मिश्रित तथा अगेती फसल के बोने के अनुसार करते हैं। जब अरहर की फसल की बुवाई ज्वार व बाजरा आदि के साथ करते हैं, तो छिड़काव विधि प्रयोग करते हैं। अरहर की फसल को सदैव पंक्तियों में बोना उत्तम रहता है। पंक्तियों की दूरी सदैव साथ बोई गई फसल, मूंगफली, मक्का, बाजरा, मूंग, उड़द आदि पर निर्भर करती है। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 से 75 सेंटीमीटर व पौधे से पौधे की दूरी 25 से 30 सेंटीमीटर रखी जाती है। पंक्ति से पंक्ति व पौधे से पौधे की दूरी निश्चित करके, हम प्रति इकाई क्षेत्र में पौधों की संख्या को निर्धारित करते हैं।

पंक्ति व पौधों की दूरी मिश्रितअकेली फसल के अनुसार निश्चित की जाती है। प्रतिकूल परिस्थितियों जैसे मृदा धरातल का समतल न होना, चिकनी मिट्टी का होना अथवा अधोसतह में अभेद्य परत के होने से खेत में पानी ठहरना प्रारंभ हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में अनुसंधान के आधार पर पाया गया कि डोलों ( मेंड ) पर फसल की बुवाई करने से अधिक उपज प्राप्त होती है।

खाद एवं उर्वरक

दलहनी फसल होने के कारण नत्रजन की पूर्ति फसल के पौधे स्वयं कर लेते हैं। प्रारंभिक अवस्था में राइजोबियम जीवाणु की कार्य क्षमता बढ़ने तक पौधों को 20 से 30 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर बुवाई के समय ही खेत में देते हैं।

इसके पश्चात मृदा परीक्षण कराकर फास्फोरस और पोटाश की मात्रा भी मृदा में आवश्यकतानुसार दिया जाता है। आमतौर पर अरहर की फसल के लिए 80 से 100 किलोग्राम फास्फोरस व 40 से 60 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। बीजों को बोने से पहले राइजोबियम जीवाणुओं से उपचारित करना अत्यंत लाभदायक होता है इससे पौधे स्वस्थ पैदा होते हैं तथा पौधों में रोग व कीट कम लगते हैं।

सिंचाई एवं जल निकास

जून में पलेवा करके बोई गई फसल में वर्षा होने तक एक या दो सिंचाई की आवश्यकता पड़ सकती है। मृदा में 50% नमी उपलब्ध होने पर सिंचाई करनी चाहिए। सिंचाईं सदैव हल्की करनी चाहिए। वर्षा ऋतु में अगर सूखा पड़ जाए तो, आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिए। फूल आने व फलियों में दाने बनते समय मृदा में नमी का अभाव नहीं होना चाहिए, यदि मृदा में नमी कम है तो हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए।

पछेती फसल को सर्दियों में पाले से बचाने के लिए आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिए। खेतों में जल निकास का उचित प्रबंधन करना भी अति आवश्यक है। खेतों में पानी ठहरने पर उपज में भारी गिरावट आ जाती है। खेतों में जहां पर पानी ठहरता हो, वहां पर जल निकास का उचित प्रबंध करना चाहिए। इसके अलावा अगर वहां पर जल निकास का उचित प्रबंधन न हो पाए, तो वहां पर अरहर को मेंडों पर उगाना ज्यादा लाभदायक है।

निकाई गुड़ाई

अरहर की अकेली बोई गई फसल में 1 - 2 निराई गुड़ाई खुरपी की सहायता से कर सकते हैं। पहली निराई गुड़ाई बुवाई के 20 से 25 दिन के बाद करनी चाहिए। मिश्रित फसल ज्वार, मक्का आदि काटने पर अरहर की लाइनों के बीच ' हो ' या देशी हल से जुताई करने पर फसल की उपज में वृद्धि होती है। मिश्रित खेती में फसलों पर खरपतवारों का प्रकोप कम हो पाता है।

रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण करने के लिए 1 किग्रा फ्लूक्लोरेलिन ( बैसालीन ) को 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़ककर ( बोने से पहले ) भूमि में 4 से 5 सेमी गहरे मिला देते हैं। इससे अधिकतर खरपतवार नष्ट हो जाते हैं।

मिश्रित खेती

विभिन्न क्षेत्रों में अरहर की खेती मिश्रित रूप में ज्वार, बाजरा, रागी, कोदों, मक्का, कपास, उर्द, मूंग, लोबिया, मूंगफली, तिल, जूट आदि के साथ की जाती है। गन्ना के खेतों में भी चारों तरफ बाढ़ ( fencing ) के रूप में अरहर को उगाते हैं।

अरहर व मूंग की मिली-जुली खेती करने के लिए एक पंक्ति अरहर की व दो पंक्तियां मूंग की बोई जाती है। पहली लाइन अरहर की, इसके बाद 15 सेंमी. की दूरी पर एक लाइन मूंग की, फिर 30 सेंमी. की दूरी पर दूसरी लाइन मूंग की और फिर 15 सेंमी. की दूरी पर तीसरी लाइन मूंग की बोई जाती है। उड़द के साथ अरहर की मिश्रित खेती करने पर भी यही क्रम अपना सकते हैं।

फसल चक्र

विभिन्न क्षेत्रों में अपनाए जाने वाले फसल चक्र निम्न है -

1. अरहर + मक्का - गेहूं

2. अरहर + मक्का, ज्वार + मसूर

3. अरहर + मूंगफली - गन्ना

4. अरहर + ज्वार, मक्का + मटर

आजकल अरहर की अगेती जातियों ( शीघ्र पकने वाली जातियां टाइप 21, प्रभात व UPAS 120 आदि ) के बाद रबी की फसल आसानी से ले सकते हैं। इस प्रकार एक वर्षीय फसल चक्र निम्नलिखित हैं -

1. अरहर - गेहूं

2. अरहर - बसंतकालीन मक्का

3. अरहर - गेहूं - मूंग टाइप 1

4. अरहर - बसंतकालीन सोयाबीन

5. अरहर - प्याज

6. अरहर - आलू ( पछेती )

कटाई मडाई

अरहर की जाति के अनुसार, फसल 120 से 130 दिन में पककर तैयार हो जाती है। अगेती फसल नवंबर-दिसंबर व देर से पकने वाली फसल मार्च-अप्रैल में काटी जाती है। फसल को अच्छी प्रकार से खलियान में सूखाकर डण्डों से मंडाई कर लेते हैं। मंडाई के लिए पुलमैन थ्रेसर ( Pullman thresher ) को भी काम में लाया जाता है।

उपज

अरहर की जातियों के अनुसार उपज अलग-अलग प्रकार से प्राप्त होती है। लेकिन फिर भी 15 से 35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त हो जाती है। लकड़ी प्रति हेक्टेयर 50 से 60 क्विंटल तक प्राप्त हो जाती है।

संग्रह

खलिहान में फसल को अच्छी तरह से सुखाकर मंडाई कर लेते हैं। फिर दाने को अच्छी प्रकार सुखाकर जब उसमें नमी की प्रतिशतता 10-12 रह जाए, तो इसे अच्छी तरह से भण्डार में रखना चाहिए।

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