चारे की फसलों में पोषक तत्वों का महत्व अथवा कार्य लिखिए

चारे की फसलों में पोषक तत्वों का महत्व अथवा कार्य लिखिए


चारे की फसलों में पोषक तत्वों का महत्व अथवा कार्य लिखिए



चारे की फसलों में पोषक तत्वों का महत्व अथवा कार्य निम्नलिखित हैं -

1. नाइट्रोजन

नाइट्रोजन से चारे में अमीनो अम्ल, प्रोटीन एल्केलाइड व प्रोटोप्लाज्म का निर्माण होता है, प्रोटीन की गुणवत्ता बढ़ती है एवं क्रूड प्रोटीन की मात्रा में भी वृद्धि होती है। पौधों के तने व पत्तियों में सरसता, स्वादिष्टता बढ़ती है, फलस्वरुप चारे की पाचनशीलता में भी वृद्धि होती है। 

दानों में प्रोटीन की मात्रा बढ़ती है एवं दाने सुडौल तथा गूदेदार बनते हैं, फलस्वरूप पशुओं के शरीर में वृद्धि होती है। नाइट्रोजन से पौधों में फास्फोरस व पोटैशियम का उपयोग सन्तुलित होता है। दलहनी चारों व दाने में अधिक मात्रा में व अदलहनी चारों व दानों में तुलनात्मक कम मात्रा में पाया जाता है।

2. फॉस्फोरस 

पौधों द्वारा संतुलित मात्रा में फास्फोरस ग्रहण करने पर जड़ एवं वानस्पतिक वृद्धि शीघ्र होती है, पौधों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, वसा व एल्ब्यूमीन अच्छी प्रकार से बनते हैं। पौधों का स्टार्च आसानी से शर्करा में बदल जाता है, जिससे स्वस्थ एवं अधिक भार वाले बीज पैदा होते हैं, अन्य तत्वों के चूषण ( assimilation ) में वृद्धि होती है।

चारे की गुणवत्ता बढ़ती है, दलहनी फसलों में राइजोबियम की संख्या बढ़ाकर, प्रोटीन बढ़ाने में सहायक है। अधिक नाइट्रोजन के विषैले प्रभाव को दूर करता है। चारे का पाचन ( palatable ) गुण बढ़ता है। दलहनी चारों व दानों में अधिक, अदलहनी चारों व दानों में तुलनात्मक कम भूसी, तेलीय उपजात में फास्फोरस पाया जाता है। जड़ों में इसकी मात्रा कम होती है।

3. पोटैशियम

पोटैशियम पौधों में शर्करा एवं स्टार्च बनाने में सहायक होता है एवं इनका पौधों में एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरण करता है। पौधों में कार्बनिक अम्लों को उदासीन करता है एवं स्टोमेटा क्रिया में भाग लेता है। चारे की गुणवत्ता एवं स्वाद बढ़ाकर पाचनशीलता को बढ़ाता है। इससे चारे में रोग एवं कीट के प्रति रोधकता बढ़ती है।

पौधे के अन्दर पोषक तत्वों एवं कार्बोहाइड्रेट आदि के वहन में सहायक है, दाने अधिक संख्या में एवं सुडौल बनते हैं, कार्बोहाइड्रेट की मात्रा चारे में बढ़ती है, प्रकाश संश्लेषण की क्रिया को बढ़ाता है। नाइट्रोजन के विषैले प्रभाव को कम करता है एवं प्रोटीन के निर्माण में सहायक होता है। फलस्वरूप चारे की अधिक उपज प्राप्त होती है। भूसा, सूखी घास, कड़वी में पर्याप्त मात्रा में मिलता है। अनाजों में कम मात्रा में पाया जाता है।

4. कैल्शियम

कैल्शियम चारे की फसलों में जड़ों की शीघ्रता से वृद्धि करता है। दलहनी फसलों में राइजोबियम जीवाणु की संख्या बढ़ाकर प्रोटीन वृद्धि में सहायक है, पौधों में कार्बोहाइड्रेट के संचालन में सहायक है, चयापचय की क्रियाओं में कार्बनिक अम्ल जैसे - ऑक्जैलिक अम्ल के प्रभाव को घटाता है, पौधों को स्वस्थ एवं सख्त बनाता है। दलहनी चारों में पर्याप्त खली, गेहूं की भूसी में मध्यम व गेहूं, जौ, जई के भूसे एवं मक्का में बहुत कम मात्रा में मिलता है।

5. मैग्नीशियम

चारे की फसलों में पौधों के अंदर पोषक तत्वों के वहन व भूमि से पोषक तत्वों के अवशोषण में सहायक होता है। वसा एवं तेल की मात्रा बढ़ाता है। एन्जाइमिक क्रियाओं को सुचारु रुप से चलाता है, यह पर्णहरिम की रचना में आवश्यक होता है। इस प्रकार यह चारे की गुणवत्ता एवं उपज में वृद्धि करता है। मक्का, जौ, जई के हरे चारे एवं दलहनी सूखी घासों में पर्याप्त मात्रा में होता है। भूसा कड़वी एवं जड़ों में इसकी कम मात्रा पाई जाती है।

6. गंधक

यह पौधों में मूल विकास, जड़ों में ग्रंथियों के विकासपर्णहरिम की रचना में वृद्धि करता है। यह पौधों में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। गन्धयुक्त एमीनो अम्ल जैसे - आयोटीन व थायमीन के निर्माण में सहायक है। ये एमीनो अम्ल, पौधे की वृद्धि को नियंत्रित करते हैं। अधिकतर फसलों में वसा, तेल एवं सुगंधित तेलों के निर्माण में सहायक है। इस प्रकार यह चारे की गुणवत्ता व उपज में वृद्धि करता है। यह दलहन चारों एवं दानों में अधिक मात्रा में पाया जाता है।

7. लोहा

यह पौधों में पर्णहरिम की रचना, प्रोटीन निर्माण एवं चयापचय की क्रियाओं के लिए आवश्यक होता है। यह कोशिकाओं के अंदर ऑक्सीकरण ( oxidation ) एवं अवकरण ( reduction ) में उत्प्रेरक का कार्य करता है। कोशिकाओं की श्वसन क्रिया में ऑक्सीकरण के वहन में सहायक होता है एवं कोशिका विभाजन में सहायता कर चारे की उपज को बढ़ाता है।

8. ताँबा

ताँबा पौधे की वृद्धि व विकास की अनेक क्रियाओं को उत्तेजित करता है। यह पौधे में विटामिन ए के निर्माण एवं वृद्धि एवं वृद्धिकारक हार्मोन इण्डोल एसिटिक एसिड के संश्लेषण में सहायक होता है। पौधों में आवश्यक लोहे के उपयोग को बढ़ाता है एवं श्वसन प्रक्रिया को प्रभावित करता है। इसके द्वारा अधिक मात्रा में अच्छी गुणवत्ता का चारा प्राप्त होता है। तिलहनी चारों दानों में पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। गाजर आदि में यह काफी मात्रा में पाया जाता है।

9. जस्ता

जस्ता पौधों में ऑक्सीकरण में सहायक होता है, यह पौधों में प्रकाश-संश्लेषण व नाइट्रोजन चयापचय में भाग लेता है। विभिन्न एन्जाइम्स जैसे - लेसीथीनेज, सिस्टीन, डाइसल्फाइडेज एवं एक्जेलो-एसिटिक डीकार्बोक्सीलेज आदि की क्रियाशीलता को बढ़ाता है। प्रोटीन एवं कैरोटीन ( विटामिन ए ) के संश्लेषण में सहायक है। यह विभिन्न एन्जाइम्स जैसे - पेप्टीडेज, एल्कोहल डीहाइड्रोजीनेज एवं कार्बोनिक एनहाइड्रेज आदि की संरचना का तत्व है। यह भूमि से पौधों को पानी ग्रहण करने की क्षमता को बढ़ाता है।

10. मैंगनीज

मैंगनीज पौधों की विभिन्न वृद्धि क्रियाओं में उत्प्रेरक का कार्य करता है। कार्बोहाइड्रेट के निर्माण के स्वांगीकरण में सहायक होता है।

11. क्लोरीन

क्लोरीन के मुख्य कार्य पौधों में पर्णहरिम की रचना, एन्जाइम की क्रिया को उत्प्रेरित करना व रसाकर्षण दाब को बढ़ाना, इसके मुख्य कार्य है। यह कार्बोहाइड्रेट की चयापचय क्रिया को प्रभावित करता है एवं पत्तियों में पानी रोकने की क्षमता को बढ़ाता है। दलहनी एवं अदलहनी सभी प्रकार के चारों में इसकी मात्रा कम पाई जाती है। अतः पशु आहार में इसकी पूर्ति सादा नमक मिलाकर करते हैं।

12. बोरोन

बोरोन पौधों में कैल्शियम, मैग्नीशियम के अवशोषण, उपयोग एवं नियंत्रण में सहायक है। कोशिका विभाजन, कार्टेक्स के विकास एवं प्रोटीन संश्लेषण में सहायक है। यह पानी शोषण की क्रिया को नियंत्रित करता है। पेक्टिन, ATP, DNA एवं RNA के संश्लेषण में सहायक है। इस प्रकार परागण, प्रजनन क्रियाओं एवं पौधों में फल बीज बनाने में सहायक है। दलहनी फसलों की जड़ों में राइजोबियम जीवाणु की वृद्धि करता है। यह दलहनी चारों में पर्याप्त मात्रा में मिलता है।

13. मोलिब्डिनम 

यह दलहनी फसलों के राइजोबियम जीवाणुओं की वृद्धि करने में सहायक है। पौधों में विटामिन सी,  फास्फोरस चयापचयकार्बोहाइड्रेट के संश्लेषण में आवश्यक है। विभिन्न एन्जाइम्स जैसे - नाइट्रेट रिडक्टेज व जैन्थीन ऑक्सीडेज आदि का महत्वपूर्ण अंग है एवं इसकी सक्रियता बढ़ाता है। यह दलहनी चारों में पर्याप्त मात्रा में मिलता है।

विभिन्न प्रकार के पशु चारों में खनिज लवणों की प्रतिशत मात्रा


1. गेहूं, जौ व जई का भूसा - 6.0 - 6.5 प्रतिशत

2. धान का पुआल - 14.0 प्रतिशत

3. हरे चारे, मक्का, ज्वार, बाजरा, लूसर्न, बरसीम, साइलेज आदि - 1.20 2.5 प्रतिशत

4. दाना - मक्का, जई, जौ, बिनौला, ग्वार, मटर, चना - 1.5 - 4.5 प्रतिशत

5. अनाज उपजात - जई, जौ, गेहूं - 4.5 - 5.5 प्रतिशत
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