मध्यप्रदेश की मृदाओं का जलवायु के आधार पर वर्गीकरण कीजिए

मध्यप्रदेश की मृदाओं का जलवायु के आधार पर वर्गीकरण हिन्दी में


मध्यप्रदेश की मृदाओं का जलवायु के आधार पर वर्गीकरण हिन्दी में Classification of soil of Madhya Pradesh on the basis of climate in Hindi
मध्यप्रदेश की मृदाओं का जलवायु के आधार पर वर्गीकरण हिन्दी में



मध्यप्रदेश की मृदाओं को जलवायु के आधार पर दो भागों में विभाजित किया गया है -


1. मध्यप्रदेश का पहाड़ी भाग।
2. मध्यप्रदेश का मैदानी भाग।


मध्यप्रदेश के मैदानी भाग की मृदाओं को स्थानीय लोगों की बोल-चाल के आधार पर चार भागों में विभाजित किया गया है -

1. कन्हार
2. डोरसा
3. भाटा
4. मटासी

1. कन्हार 

यह मृदा शहरी, अच्छी जलधारण क्षमता वाली और अच्छी फसल उत्पादन क्षमता वाली होती हैं, परन्तु प्रबंधन की समस्या की वजह से ये मृदाऐं Mostly under utilizes हैं। यदि संकीर्ण अनुकूल मृदा नमी रेन्ज हो तथा flooding करने पर इन मृदाओं का उपयोग, निचली दशाओं में जहां ऊपरी भूमियों से अप्रभावित जल आकर एकत्र होता है, धान उगाने के लिए किया जाता है। इन मृदाओं का एक बड़ा भाग उच्च भूमि के रूप में है। वर्षा ऋतु में कोदो-कुटकी एवं अरहर या फिर रबी में चना, सरसों या अलसी जैसी फसलों का उत्पादन वर्ष में एक ही बार लिया जाता है।

2. डोरसा

ये मिट्टियां स्थलाकृतिक दृष्टि से मध्यम ऊंचाई वाली स्थिति में होती हैं तथा ये गहरी एवं अच्छी जल धारण क्षमता वाली ( मटासी से लगभग दोगुनी ) होती है। ये मिट्टियां अधिकतर समतल एवं मेड वाली होती है। इस स्थिति में सूखे का प्रभाव तुलनात्मक दृष्टि से कम होता है। इन मृदाओं में धान के पश्चात् उगाई जाने वाली फसलों ( post rice crops ) की उपज कम होने का मुख्य कारण अवशिष्ट नमी की कमी ही नहीं अपितु मृदा की खराब भौतिक दशाऐं, उपयुक्त पौध संख्या को स्थापित एवं early plant vigour को promot करने में प्रबंधन की समस्या भी मुख्य कारण है।

अतः इन मृदाओं की उत्पादकता का उपयुक्त दोहन करने के लिए उपयुक्त पौध संख्या सुनिश्चित करने तथा early plant vigour को promot करने के साथ ही सीमित आर्थिक उर्वरक उपयोग करना चाहिए, जिससे कि जडें ज्यादा गहराई में जाकर संचित मृदा नमी का उपयोग का सकती है।

3. भाटा

ये मृदाऐं एण्टीसोल गण के अंतर्गत आती हैं। ये मृदाऐं ढाल के ऊपरी भाग पर होती हैं‌। इन मृदाओं में रेतीली मिट्टी के साथ-साथ कंकड़ भी पाये जाते हैं‌। इन मृदाओं की गहरी एवं जलधारण क्षमता बहुत कम होती है। ये मृदाऐं लाल रंग की होती हैं। यह मृदाऐं पानी में गीली होने पर काफी कड़ी हो जाती है। इन मृदाओं की उत्पादन क्षमता काफी कम होती है, इन मृदाओं का करीब 20 प्रतिशत क्षेत्र है जो कि अधिकतर फसलों के लिए अनुपयुक्त या बंजर क्षेत्र है।

यह मृदा कठोर होने के कारण गैर कृषि कार्य एवं भवन निर्माण के लिए उपयुक्त है। इस मृदा में अच्छी वर्षा होने पर एवं खाद की उपस्थिति में मोटे अनाज उत्पन्न किए जा सकते हैं।

4. मटासी

मृदा नाम पद्धति के अनुसार ये मृदाऐं एण्टीसोल के अंतर्गत आती हैं। ये अपरिपक्व तथा कम विकसित प्रोफाइल वाली मिट्टियां होती है। ये मृदाऐं हल्की तथा उत्पत्ति से मध्यम गहराई की होती हैं। गली मटासी मृदाऐं मुलायम एवं अचिपचिपी होती हैं। यह मृदाऐं कृषि कार्य के लिए उपयुक्त होती हैं। ये मृदाऐं हल्के रंग की होती हैं। अच्छी सिंचाई की व्यवस्था होने पर इन मृदाओं से धान एवं गेहूं की अच्छी पैदावार ली जा सकती है।

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