ऐसे करें गेहूं की फसल में लगने वाले रोगों की पहचान एवं रोकथाम

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गेहूं की फसल में लगने वाले रोग इस प्रकार हैं


• रतुआ या गेरुई या हरदा ( rusts )

(अ) पीली गेरुई या पीला रतुआ ( yellow rust or stripe rust )

(ब) भूरी गेरुई या भूरा रतुआ ( brown rust or leaf rust )

(स) काली गेरुई या काला रतुआ ( black rust or stem rust )

• कंडुवा रोग या अनवृन्त कण्ड ( loose smut of wheat )

• झुलसा रोग ( Alternaria blight )

• गेहूं का सेंहू रोग ( ear cockle and tundu disease )

• चूर्णी फफूंदी रोग ( powdery mildew )

• बंट रोग ( bunt disease )

(क) करनाल बंट ( karnal bunt )

(ब) पहाड़ी बंट 

• ध्वज कण्ड ( flag smut )


गेहूं की फसल में लगने वाले सभी रोग, उनकी पहचान एवं उनकी रोकथाम ऐसे करें, ऐसे करें गेहूं की फसल में लगने वाले सभी रोगों की पहचान एवं उनकी रोकथाम
ऐसे करें गेहूं की फसल में लगने वाले सभी रोगों की पहचान एवं उनकी रोकथाम



गेहूं की फसल में लगने वाले हानिकारक रोग और उनकी रोकथाम


गेहूं की फसल में फफूंदी के कारण कई रोग लगते हैं जिनसे फसल को कभी-कभी अत्यधिक हानि हो जाती है। इनमें से मुख्य बीमारियां निम्न प्रकार नीचे दी गई हैं - 

• रतुआ या गेरुई या हरदा ( rusts ) 


जिस प्रकार हमें लोहे पर जंग लगा हुआ नजर आता है उसी प्रकार गेहूं पर गेरुई का प्रकोप होता है। गेहूं की फसल में तीन प्रकार की गेरुई लगती है : -

(अ) पीली गेरुई या पीला रतुआ ( yellow rust or stripe rust )

(ब) भूरी गेरुई या भूरा रतुआ ( brown rust or leaf rust )

(स) काली गेरुई या काला रतुआ ( black rust or stem rust )

गेहूं की फसल में ये तीनों गेरुई अलग-अलग फफूंदों द्वारा फैलाई जाती हैं। पीली गेरुई Puccinia striiformis द्वारा, भूरी गेरुई P. reconditu द्वारा तथा काली गेरुई P. graminis tritici द्वारा लगती है।


(अ) पीली गेरुई या पीला रतुआ ( yellow rust or stripe rust ) 


इस रोग का मुख्य लक्षण पत्तियों पर धारियों में पीले धब्बे दिखाई देते हैं। यह रोग भारत के अधिकतर पंजाब, हिमाचल प्रदेश और कभी-कभी बिहार आदि राज्यों में दिखाई देता है। पत्तियों पर छोटे-छोटे हल्के पीले रंग के धब्बे बन जाते हैं। जो रोग की अंतिम अवस्था में काले पड़ जाते हैं।

यह धब्बे रोग के अधिक बढ़ने के कारण तने और बालियों पर भी पहुंच जाते हैं। यह रोग अधिक ठंडे और नम वातावरण में फैलता है। इस रोग से प्रभावित पौधे की बालियों में जो दाने होते हैं वह बहुत हल्के और कमजोर होते हैं। जब रोग बालियों पर पहुंच जाता है तो बालियों में दाने नहीं बन पाते हैं।

(ब) भूरी गेरुई या भूरा रतुआ ( brown rust or leaf rust )


इस रोग के कारण पत्तियों पर भूरे या नारंगी रंग के धब्बे बन जाते हैं। यह धब्बे बाद में काले रंग के हो जाते हैं और बिखरी हुई अवस्था में रहते हैं। रोग के अधिक प्रकोप के कारण ये धब्बे पौधे के तने पर भी बन जाते हैं। यह रोग पौधों में दिसंबर के अंतिम सप्ताह में दिखाई देता है।

जब फसल 5 या 6 सप्ताह की हो जाती है। इसके लिए 15°C से 25°C का तापक्रम अनुकूल है। इस रोग का प्रकोप लगभग पूरे भारत में पाया जाता है।

(स) काली गेरुई या काला रतुआ ( black rust or stem rust )


इस रोग का प्रकोप देर से बोई गई फसलों पर अधिक होता है। यह गर्म और तर वातावरण में अधिक पनपता है। साधारणतया यह मार्च के प्रथम सप्ताह में देखा जाता है। इसका प्रकोप पौधे के तने पर होता है और तने के ऊपर लंबे लाल भूरे रंग के उभरे हुए धब्बे बन जाते हैं जो रोग के अधिक प्रकोप में पौधों के अन्य भागों पर भी देखे जा सकते हैं।

रतुआ या गेरुई या हरदा रोग की रोकथाम के उपाय :-


1. रतुआ या गेरुई या हरदा रोग की रोकथाम के लिए रोग प्रतिरोधक वाली किस्मों को उगाना चाहिए।

2. फसल की बुवाई समय पर करनी चाहिए।

3. आवश्यकता से अधिक सिंचाई नहीं करनी चाहिए व नाइट्रोजन की मात्रा को कम करना चाहिए।

4. जीनेब ( डाइथेन जैड - 78 ) का छिड़काव करने से काली और भूरी गेरुई को रोका जा सकता है।

5. डाइथेन एम - 45 ( मीनेब ) नामक दवाई का छिड़काव 0.2% के हिसाब से पानी में घोलकर करना चाहिए। इसके लिए 1000 लीटर पानी में 2 किलोग्राम दवाई डालनी चाहिए। दवा के घोल में 0.2% सैडोविट नामक चिपकाने वाला पदार्थ भी डालना चाहिए। 

इसके लिए 1000 लीटर घोल में 1 लीटर सैडोविट पर्याप्त रहता है। जनवरी के अंतिम या फरवरी के प्रथम सप्ताह में इसका छिड़काव करना चाहिए। 10 या 15 दिन के अंतर पर 3 या 4 छिड़काव करना चाहिए।

6. देर से बोई गई गेहूं की फसल में काली और भूरी गेरुई का अधिक प्रकोप होता है। अतः गेहूं की फसल की बुवाई समय पर करनी चाहिए। देर से पकने वाली गेहूं की जातियों को नवंबर के पहले या दूसरे सप्ताह में बो देना चाहिए।

7. गेहूं की फसल में अधिक नाइट्रोजन वाली खाद देने पर भी रोगों का प्रभाव अधिक होता है। इसलिए हमेशा बुवाई के पहले मिट्टी की जांच कराकर उचित मात्रा में नाइट्रोजन के साथ-साथ फास्फोरस और पोटाश की भी देनी चाहिए।

• कंडुवा रोग या अनवृन्त कण्ड ( loose smut of wheat )


यह बीज जनित फफूंद रोग हैं। इस रोग में जब पौधे में बालियां आती हैं तो उनमें दानों के स्थान पर काला चूर्ण बन जाता है और कुछ समय बाद पूरी बाली समाप्त हो जाती है। केवल रैचीस ( rachis ) शेष बचती है। 

यह चूर्ण हवा द्वारा दूसरी बालियों पर पहुंच जाता है और जब इन बालियों के बीजों को बोया जाता है तो पौधे पर फिर काली चूर्णयुक्त बालियां आती हैं। अतः ये बीज देखने में स्वस्थ दिखाई देते हैं, लेकिन यह बीमार रहते हैं।

कंडुवा रोग या अनवृन्त कण्ड रोग की रोकथाम


1. रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर बड़ी सावधानी के साथ पॉलिथीन की थैलियों में बंद करके मिट्टी में दबा देना चाहिए।

2. प्रमाणित बीज ही बोने चाहिए।

3. रोगरोधी किस्मों ( WL 711, HD 2009, WL 410 आदि को ) को बोना चाहिए।

4. बीजों को 4 घंटे भिगोने के बाद मई व जून की धूप में अच्छी तरह सुखाकर भंडारण में अगले वर्ष के लिए रखना चाहिए।

5. बीजों को 0.25% की दर से बैयटान ( baytan ) या बैनामाइल ( benamyl ) या वीटावेक्स ( vitavax ) से उपचारित करके बोना चाहिए। 


• झुलसा रोग ( Alternaria blight )


गेहूं की फसल में यह रोग भी फफूंद द्वारा लगता है या तो यह फफूंद बीज में रहती है या फसल के मलवे में यह जीवित रहती है। झुलसा रोग नम और गर्म वातावरण में जब पौधे एक से डेढ़ महीने के होते हैं, अधिक लगता है। पहले इसका आक्रमण पौधे की निचली पत्तियों पर होता है और बाद में पूरे पौधे पर।

इसके प्रभाव से पत्तियों पर पीले भूरे रंग के छोटे-छोटे अंडाकार धब्बे बन जाते हैं। रोग बढ़ने पर कई धब्बे एक जगह मिलकर पूरी पत्ती को रोगग्रस्त कर देते हैं। वातावरण में नमी के कारण इन धब्बों पर काला चूर्ण दिखाई देता है, जिसमें फफूंद के बीजाणु होते हैं।

झुलसा रोग की रोकथाम के उपाय


1. रोगरोधी किस्में एवं प्रमाणित बीजों को ही होना चाहिए।

2. जिनेब का छिड़काव करने से भी रोग को एक सीमा तक रोका जा सकता है। छिड़काव के समय थोड़ा यूरिया भी इसमें मिला लेना चाहिए।

• गेहूं का सेंहू रोग ( ear cockle and tundu disease )


गेहूं की फसल का यह रोग सूत्रकृमि ( Nematode ) Aquena tritici द्वारा फैलता है। इस रोग के प्रभाव के कारण पौधे की पत्तियां मुड़ जाती हैं। दानों के स्थान पर बालियां फूल जाती हैं। बालियों पर एक गोंद जैसा चिपचिपा पदार्थ पाया जाता है। बालियों पर पीली कत्थई रंग की रचना सी बन जाती है।

रोगी बालियां अन्य बालियों से अपेक्षाकृत छोटी होती हैं व अधिक समय तक हरी बनी रहती हैं। रोगी पौधे छोटे रह जाते हैं। जड़ को छोड़कर पौधे के सभी भागों पर पिटिकाएँ बनती हैं।

गेहूं का सेंहू रोग के रोकथाम के उपाय


1. खेतों से रोगग्रसित पौधों को तुरंत उखाडकर अलग कर देना चाहिए।

2. प्रमाणित, पिटिका, रहित बीज लेना चाहिए।

3. फसल को बोने से पहले खेत की कड़ी धूप में अच्छी जुताई करनी चाहिए।

4. नैमाफास ( दानेदार ) रसायन की 10 किग्रा. मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से, बुआई पूर्व खेत में मिलाने पर, इस रोग का कम प्रकोप होता है।

• चूर्णी फफूंदी रोग ( powdery mildew )


गेहूं की फसल में यह रोग इराईसीफी ग्रमनीस ( Erysiphe graminis ) नामक फफूंद द्वारा लगता है। चूर्णी फफूंदी रोग के लक्षण पत्तियों, बालियों, व स्पाईकिकाओं पर सफेद चूर्ण के रूप में दिखाई देते हैं। बाद में पत्तियों का रंग पीला व कत्थई होकर पत्तियां सूख जाती हैं।

चूर्णी फफूंदी रोग के रोकथाम के उपाय


1. 15 से 20 किग्रा. बारीक गंधक की धूलि प्रति हेक्टेयर बखेरनी चाहिए।

2. गेहूं की रोगरोधी किस्में बोनी चाहिए।

• बंट रोग ( bunt disease )


बंट दो प्रकार के होते हैं :-

(क) करनाल बंट ( karnal bunt )


यह फफूंद द्वारा लगने वाला रोग है। इस रोग में किसी विशेष बाली में कुछ दाने ही काले चूर्ण में बदलते हैं। इसके बीजाणु मिट्टी में पाए जाते हैं। यह रोग नम वातावरण में अधिक फैलता है।

(ब) पहाड़ी बंट 


इसमें बाली के अंदर कुछ फूले हुए बदरंगे दाने बनते हैं जिनमें चिपचिपा चूर्ण भरा रहता है। इस चूर्ण में सड़ी मछली जैसी गंध आती है।

बंट रोग के रोकथाम के उपाय


1.गेहूं की रोगरोधी किस्में ( H.D. 2281, H.D. 2278, मालवीय 37, राज 1555 आदि ) व प्रमाणित बीजों की बुवाई करनी चाहिए।

2. पहाड़ी बंट को रोकने के लिए वाइटावैक्स या एग्रोसन जी. एन. का प्रयोग भी बीजों के उपचार के लिए लाभदायक सिद्ध हुआ है।

3. जीनेब का छिड़काव भी लाभदायक रहता है।

• ध्वज कण्ड ( flag smut )


यह रोग यूरोसिस्ट ट्रिटिकाई नामक फफूंद से लगता है। ध्वज कण्ड रोग के प्रभाव के कारण पत्तियों पर भूरी काली व चौड़ी फूली हुई रचनाऐं दिखाई देती हैं। बाद में इनमें काला चूर्ण निकलता है, जिनमें फफूंद के बीजाणु भूसे और अनाज द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं। ये मिट्टी में भी काफी दिनों तक जीवित रह सकते हैं।

ध्वज कण्ड रोग के रोकथाम के उपाय


1. गेहूं की रोगरोधी किस्मों की बुवाई करनी चाहिए।

2. प्रमाणित बीजों को ही बोना चाहिए।

3. फसल में समय-समय पर एवं आवश्यकता पड़ने पर ही सिंचाई करनी चाहिए। आवश्यकता से अधिक सिंचाई नहीं करनी चाहिए।

4. उचित फसल-चक्र को अपनाना चाहिए।

5. एक किलोग्राम बीज में 4 ग्राम की दर से वाइटावैक्स नामक दवा मिलाएं।

गेहूं की फसल में लगने वाले रोगों से मिलते-जुलते कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. गेहूं की फसल में कितने प्रकार की गेरुई लगती है?

उत्तर - गेहूं की फसल में तीन प्रकार की गेरुई लगती है :-

• पीली गेरुई ( yellow rust or stripe rust )

• भूरी गेरुई ( brown rust or leaf rust )

• काली गेरुई ( black rust or stem rust )

प्रश्न 2. गेहूं की फसल में लगने वाले झुलसा रोग की रोकथाम के उपाय लिखिए?

उत्तर - गेहूं की फसल में लगने वाले झुलसा रोग की रोकथाम के उपाय :-

• रोगरोधी किस्मों को बोना चाहिए।

• हमेशा प्रमाणित बीजों की ही बुवाई करनी चाहिए।

• जिनेब का छिड़काव करने से भी रोक को रोका जा सकता है। छिड़काव के समय थोड़ा यूरिया भी इसमें मिला लेना चाहिए।

प्रश्न 3. गेहूं में चूर्णी फफूंदी रोग किस फफूंद द्वारा लगता है?

उत्तर - गेहूं में चूर्णी फफूंदी रोग इराईसीफी ग्रमनीस ( Erysiphe graminis ) नामक फफूंदी द्वारा लगता है।

प्रश्न 4. गेहूं की फसल में कितने प्रकार के बंट रोग लगते हैं?

उत्तर - गेहूं की फसल में दो प्रकार के बंट रोग लगते हैं :-

• करनाल बंट ( Karnal bunt ) 

• पहाड़ी बंट

प्रश्न 5. गेहूं की फसल में लगने वाले ध्वज कण्ड रोग के लक्षण लिखिए?

उत्तर - गेहूं की फसल में लगने वाले ध्वज कण्ड रोग के लक्षण :- इस रोग के लगने से पत्तियों पर भूरी काली व चौडी फूली हुई रचनाएं दिखाई देती। बाद में इनमें काला चूर्ण निकलता है, जिसमें फफूंद के बीजाणु भूसे और अनाज द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं। ये मिट्टी में भी काफी दिनों तक जीवित रह सकते हैं।


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