जल-निकास की प्रमुख विधियाँ लिखिए

जल-निकास की प्रमुख विधियाँ लिखिए

जल-निकास की नालियां भूमि के अंदर विभिन्न प्रणालियों (systems) में खेत के धरातल को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। ये मुख्यतः तीन प्रणालियां है -


(1) प्राकृतिक प्रणाली ( natural systems )


यह प्रणाली छोटे-छोटे व बिखरे जल जलाक्रांत (जलभराव) क्षेत्रफलों हेतु अधिक उपयुक्त है। इस प्रकार की नालियां जैसे ढाल की दशा बदलती है, दिशा बदलती है व खेत का व्यर्थ पानी नदी-नालों तक पहुंचा देती हैं।

(2) हैरिंग बोन प्रणाली ( harring bone systems )


जब मुख्य जल निकास नाली खेत के बीचों-बीच गुजरती है व सहायक जल निकास नालियां इसमें आकर मिलती है तो यह प्रणाली हैरिंग बोन कहलाती है। बीच में अपेक्षाकृत उच्च धरातल वाले खेतों में यह प्रणाली अधिक उपयुक्त है।

(3) गिरिडिरोन प्रणाली ( giridiron system )


इस प्रणाली के अंतर्गत जल निकास की नाली खेत के उस सिरे पर होती है, जिसका धरातल नीचा होता है, व सहायक जल निकास की नालियां इसमें मिलती रहती हैं, जो पूरे क्षेत्र का निकास जल मुख्य नाली में लाती है।


जल-निकास की प्रणालियाँ एवं विधियाँ systems and methods of drainage
जल-निकास की प्रमुख विधियाँ लिखिए


जल-निकास की विधियाँ ( Methods of drainage )


जल-निकास की विभिन्न विधियाँ निम्न प्रकार हैं -


(1) पृष्ठीय जल निकास ( Surface drainage )


1. अस्थाई नालियां ( Temporary drains )
2. कट-आउट नालियां ( cut out drains )
3. स्थाई नालियां ( Permanent drains )
4. समतल भूमि में मेड़ों को काटकर ( Land smoothing method )


(2) भूमिगत जल निकास ( Underground drainage )


1. टाइल ड्रेन्स ( tile drains )
2. मोल ड्रेन्स ( mole drains )
3. स्टोन ड्रेन्स ( stone drains )
4. पाइप ड्रेन्स ( pipe drains )
5. पोल ड्रेन्स ( pole drains )

पृष्ठीय जल निकास ( Surface drainage )


भारत देश में प्रायः इसी विधि का प्रयोग किया जाता है। इस विधि के अनुसार भूमि की ऊपरी सतह से खुली नालियों द्वारा जल निकास किया जाता है। मुख्य नदियां सदैव निचले धरातल की ओर होती हैं। ये निकास नालियां खेतों के धरातल से कम से कम 30 सेंटीमीटर गहरी हो।

चिकनी भूमियों पर मुख्य नालियों का अंतर अथवा सहायक नदियों की लंबाई अधिक रखते हैं तथा रेतीली भूमियों पर सहायक नालियों की लंबाई कम रखते हैं। इसके निम्नलिखित विधियां हैं -

1. अस्थाई नालियां ( Temporary drains )


खेतों में थोड़े-थोड़े अंतर 10-15 सेंटीमीटर गहरी नालियां बनाकर इन्हें मुख्य नाली से जोड़ देते हैं। इन नालियों में आवश्यकता अनुसार परिवर्तन किया जा सकता है और इच्छा अनुसार इनको समाप्त भी कर सकते हैं।

2. कट-आउट नालियां ( cut out drains )


नहर के समीपवर्ती क्षेत्रों में जहां खेतों के धरातल से अधिक ऊंचाई पर नहर होती है, वहां अपसरण (seepage) के द्वारा किनारे वाले खेतों में पानी एकत्रित होता रहता है। अतः नहर एवं खेतों के बीच 60-90 सेंटीमीटर गहरी व 1-1.5 मीटर चौड़ी नालियां बना देते हैं, जिनमें नहर से आया हुआ पानी इकट्ठा होता रहता है। इन नालियों का संबंध मुख्य निकास नाली से कर देते हैं।

3. स्थाई नालियां ( Permanent drains )


प्रायः निचले स्थानों पर जहां जल निकास की समस्या आवश्यक रूप से होती है वहां इस कार्य के लिए स्थाई, मुख्य एवं सहायक नालियां बनाई जाती हैं। मुख्य नाली के द्वारा व्यर्थ पानी नालों एवं नदियों तक पहुंचा दिया जाता है।

4. समतल भूमि में मेड़ों को काटकर ( Land smoothing method )


जिन स्थानों पर खेत समतल होते हैं वहां वर्षा का पानी समान रूप से खेत में भर जाता है। ऐसी परिस्थिति में खेत की मेड़ काटकर अतिरिक्त पानी को खेत से बाहर निकाल दिया जाता है।

(2) भूमिगत जल निकास ( Underground drainage )


भूमिगत जल निकास के अंतर्गत भूमि के अंदर नालियां बनाकर व्यर्थ पानी को निकालने की व्यवस्था की जाती है। प्रायः जल स्तर उठ जाने पर धरातल पर बनी खुली नालियां अधिक कारगर सिद्ध नहीं होती हैं।

ऐसी दशा में जल निकास के लिए सहायक व मुख्य जल निकास नालियां भूमि के अंदर 0.9 मीटर से 1.80 मीटर की गहराई में तैयार की जाती हैं। भूमिगत जल निकास की निम्नलिखित प्रमुख विधियां प्रयोग में लाई जाती हैं -

1. टाइल (खपरैल) जल निकास नालियां ( tile drains )


खपरैल से बनी भूमिगत जल निकास नालियां सर्वोत्तम रहती हैं। इनसे अपेक्षाकृत अधिक दिनों तक काम लिया जा सकता है। चिकनी मिट्टी अथवा कंक्रीट की 30 सेंटीमीटर लंबी व 10 सेंटीमीटर व्यास वाली अर्धवृत्ताकार खपरैलों को भूमि के अंदर 75 से 120 सेंटीमीटर की गहराई पर खोदी गई नालियों के ऊपर बिछाकर मिट्टी से ढक देते हैं।

नालियों की आपस की दूरी चिकनी ( भारी ) भूमि में 25 मीटर तथा हल्की भूमियों में 50 मीटर रखते हैं। पानी के ठीक बहाव के लिए नालियों का ढाल प्रति 30 मीटर की लंबाई में 5 सेंटीमीटर रखते हैं।

2. मोल निकास नालियां ( mole drains )


एक विशेष प्रकार के बने मोल हल ( mole plough ) के द्वारा भूमि के अंदर 8-10 सेंटीमीटर व्यास वाली नालियां 45 से 75 सेंटीमीटर की गहराई पर बिना पृष्ठ मृदा को ढके, तैयार की जाती हैं। यह विधि भारी भूमियों के लिए यूरोप के देशों में काफी अपनाई जाती है।

3. पत्थर की नालियां ( stone drains )


भूमि की सतह से लगभग 1.25 मीटर नीचे पत्थरों की सहायता से नाली बनाई जाती है, सहायक नालियों को 4.5 से 10.0 मीटर की दूरी पर बनाते हैं। ये नालियां ' V ' आकार कि बनाते हैं । नाली के ऊपर भी पत्थर के टुकड़ों को चुनने के बाद ऊपर से मिट्टी डालकर ढक देते हैं।

व्यर्थ पानी रिस-रिस कर पत्थर के टुकड़ों के बीच होकर सहायक एवं मुख्य जल निकास नाली तक पहुंच जाता है।
इस प्रकार की बनी नालियों में बहुत जल्दी मिट्टी भर जाती है और फिर ये काम करना बंद कर देती हैं।

4. पाइप नालियां ( pipe drains )


इस विधि के अनुसार भूमि में लगभग 1 मीटर नीचे 10-15 सेंटीमीटर व्यास के छिद्र युक्त लोहे अथवा सीमेंट-कंक्रीट के नल केवल सहायक नालियों में बिछा देते हैं एवं उनका संबंध मुख्य नाली से कर दिया जाता है।

5. पोल नालियां ( pole drains )


जिन स्थानों पर लकड़ी आसानी से प्राप्त हो जाती है, वहां लकड़ी की सहायता से जल निकास नालियां बनाई जाती हैं। लकड़ी के टुकड़ों को भूमि में लगभग 1.0 मीटर की गहराई पर तिकोनी शक्ल में चुन-चुन कर रखा जाता है।

नाली की चौड़ाई 30 सेंटीमीटर रखते हैं। भूमि का व्यर्थ पानी लकड़ी के टुकड़ों के मध्य से रिसकर सहायक नालियों से होता हुआ मुख्य जल निकास नाली में पहुंच जाता है। लकड़ी के टुकड़े प्रायः गीले रहने के कारण सड़ जाते हैं एवं नालियों में मिट्टी भर जाती है। फलस्वरुप बार-बार श्रम, धन एवं समय की हानि होती है।

पृष्ठीय एवं भूमिगत जल-निकास नालियों में अंतर

पृष्ठीय एवं भूमिगत जल-निकास नालियों में अंतर निम्नलिखित है - 


पृष्ठीय जल-निकास नालियां


1. पृष्ठीय जल-निकास की नालियां खेत की ऊपरी सतह पर होने के कारण कृषि कार्यों में अत्यंत बाधा होती है।

2. नालियों के निर्माण की प्रारंभिक कीमत कम होती है।

3. खेत के अन्दर जोत का क्षेत्रफल कम हो जाता है। क्योंकि खेत का कुछ हिस्सा इन नालियों द्वारा घेर लिया जाता है।

4. इन नालियों की प्रतिवर्ष मरम्मत करवानी पड़ती है जिससे व्यय अधिक होता है।

5. मृदाक्षरण अधिक होता है।

6. मृदा की भौतिक दशा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

7. मरम्मत आदि में समय और खर्च कम होता है।

8. भोज्य तत्वों का निक्षालन द्वारा ह्मस नहीं होता है।

9. जल-निकास आसानी से होता है, इसमें किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं होती है।

10. सहायक नालियों पर आवागमन में बाधा उत्पन्न होती है। अतः पुलियों आदि पर अधिक अतिरिक्त व्यय करना पड़ता है।

भूमिगत जल-निकास नालियां

1. इसमें कृषि कार्यों में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती है।

2. इन नालियों के निर्माण की प्रारंभिक कीमत अधिक होती है।

3. इन नालियों द्वारा जोत के क्षेत्रफल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

4. इन नालियों की प्रतिवर्ष मरम्मत नहीं करवानी पड़ती है अतः मरम्मत में व्यय कम होता है।

5. मृदा क्षरण की कम संभावना होती है।

6. इसके द्वारा मृदा की भौतिक दशा भी सुधरती है।

7. मरम्मत आदि में समय और खर्च अधिक होता है।

8. भोज्य तत्व इन नालियों द्वारा निक्षालन के द्वारा बाहर नष्ट हो सकते हैं।

9. ये नालियां भूमि के अंदर से बनाई जाती है। जिसके द्वारा कभी-कभी उनमें कचरा भर जाता है जिसके कारण जल निकास आसानी से नहीं हो पाता है।

10. इसमें इस प्रकार का कोई अतिरिक्त व्यय नहीं करना पड़ता है।

जल-निकास की प्रणालियाँ एवं विधियों से मिलते-जुलते कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. जल-निकास का क्या मतलब होता है?

उत्तर - जल-निकास :- बरसात के दिनों में अधिक पानी गिरने के कारण खेतों में ढाल दार स्थानों पर अतिरिक्त जल जमा हो जाता है। जिसके कारण वहां की भूमि दलदलीये हो जाती है। जिससे वहां पर उगने वाले पौधे की जड़ें सड जाने के कारण पौधे मर जाते हैं।

इससे हमें पैदावार में बहुत घाटा लगता है। इसलिए हमें बरसात के दिनों में ढाल दार स्थानों पर उचित जल-निकास की व्यवस्था करनी चाहिए।

प्रश्न 2. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है वर्णन करो?

उत्तर - खेतों में सिंचाई करने से फसलों के उगाने में फसलों को मदद मिलती है। इसके साथ ही औसत से कम वर्षा होने के कारण मिट्टी में पानी की प्रतिशत मात्रा कम हो जाती है। जिसके कारण पौधे सूखने लगते हैं और फिर तुरन्त मर जाते हैं। इसलिए सिंचाई करने से मिट्टी में पानी की प्रतिशत मात्रा को बढ़ाया जा सकता है और सिंचाई करने के बाद पौधों को आवश्यक पानी की मात्रा प्राप्त हो जाती है जिससे  पौधे अच्छी ग्रोथ करने लगते हैं। अतः खेतों में सूखा पड़ने पर सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 3. जल निकास की नालियां चिकनी भूमि में एवं हल्की भूमियों में कितनी दूरी पर बनानी चाहिए?

उत्तर - जल निकास की नालियां चिकनी भूमि में 20-25 मीटर एवं हल्की भूमियों में 40-45 मीटर की दूरी पर बनानी चाहिए।

प्रश्न 4. नहरों के आसपास के खेतों में जल-निकास के लिए कौन सी नालियां बनाई जाती है?

उत्तर - नहरों के आसपास के खेतों में जल-निकास के लिए कट - आउट नालियां बनाई जाती है।

प्रश्न 5. खुली नालियों द्वारा जल-निकास में होने वाले चार लाभ लिखिए?

उत्तर - खुली नालियों द्वारा जल-निकास में होने वाले चार लाभ निम्नलिखित हैं -


1. खुली नालियों द्वारा खेतों से जल-निकास आसानी से हो जाता है।

2. खुली नालियों को बनाने में ज्यादा परिश्रम एवं ज्यादा खर्चा नहीं करना पड़ता है।

3. खुली नालियों में यदि जल-निकास होते समय नाली में कचरा अड़ जाए तो आसानी से देखा जा सकता है और फिर इस कचरे को नाली में से निकाल कर बाहर फेंक कर फिर से जल निकास आसानी से करवाया जा सकता है।

4. खुली नालियां किसी भी खेत में आसानी से बनाई जा सकती है।

5. खुली नालियों की मरम्मत करने में समय एवं खर्च कम लगता है।

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