मूँग की खेती कैसे की जाती है

मूँग की उन्नत खेती का महत्व ( Importance of green gram )


मूँग एक फलीदार फसल है जिसे मुख्य रूप से दाल के लिए प्रयोग किया जाता है। दाने के साथ-साथ फसल की पत्तियों और तने से पर्याप्त मात्रा में भूसा प्राप्त होता है, जो जानवरों के चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है।

मूंग को हरी खाद के लिए भी प्रयोग किया जाता है। मूंग की जड़ों में सूक्ष्म जीवाणु पाए जाते हैं जो वायुमंडल की नाइट्रोजन को एकत्रित करते हैं जो अगली फसल के द्वारा प्रयोग की जाती है। इसे मृदा अपरदन अवरोधी तथा कैच क्रॉप के रूप में प्रयोग करते हैं।

मध्यप्रदेश में मूंग खरीफ एवं ग्रीष्म दोनों मौसमों में कम समय में पकने वाली मुख्य दलहनी फसल है। मूंग में 24- 26% प्रोटीन, 55-60% कार्बोहाइड्रेट एवं 1.3% वसा पाया जाता है।


मूँग की खेती Cultivation of green gram
मूँग की उन्नत खेती कैसे करें पूरी जानकारी हिंदी में  Cultivation of green gram in hindi


वानस्पतिक नाम ( Botanical Name )


विग्ना रेडियेटा ( Vigna radiata )

कुल ( Family )


लेग्यूमिनेसी ( Leguminaceae )

उत्पत्ति ( Origin )


मूंग का उत्पत्ति स्थान भारत को ही माना जाता है। इसमें कोई मतभेद नहीं है। अतः मूंग का उत्पत्ति स्थान भारत है।

मूंग का क्षेत्रफल एवं वितरण  ( Area and Distribution )


मूंग की खेती उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार तथा पश्चिमी बंगाल में प्रायः की जाती है। उत्तरी भारत में मूंग की खेती ज्यादातर खरीफ ऋतु में की जाती है। वैसे तो मूंग की खेती को तीन वर्गो में बांटा गया है -

1. बसंतकालीन मूंग ( spring season moong ) - इस सीजन की अवधि फरवरी-मार्च से मई-जून तक है।

2. ग्रीष्मकालीन मूंग ( summer season moong ) - इसकी अवधि अप्रैल से जून तक होती है।

3. खरीफ ऋतु की मूंग ( kharif season moong ) - इस सीजन की अवधि जुलाई से सितंबर-अक्टूबर तक होती है।

भारत में लगभग 308 मिलियन हेक्टेयर में मूंग की खेती की जाती है तथा इसका उत्पादन 1.31 मिलियन टन प्रति वर्ष है। मूंग की औसत उत्पादकता 4.25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश में गुना एवं निमाड़ी जिले में इसकी खेती अधिक क्षेत्रफल में की जाती है।

मूंग की फसल के लिए उपयुक्त जलवायु ( climate )


मूंग के लिए गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है। मूंग को समुद्र तल से 2,000 फीट की ऊंचाई तक उगाया जा सकता है। 60 से 75 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र मूंग की खेती के लिए उपयुक्त रहते हैं। पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिए 25-35°C तापमान उपयुक्त रहता है।

मूंग की खेती में फलियों के पकते समय शुष्क मौसम तथा उच्च तापमान की जरूरत होती है। फलियां पकते समय बर्षा होने के कारण फलियों के दाने सड़ सकते हैं। मूंग की खेती के लिए कम तापक्रम एवं पाला अत्यंत हानिकारक होता है।

मूंग की उन्नतशील किस्में (Improved Varieties)


बसन्त व ग्रीष्मकालीन मूंग के लिए - 


टाइप-1, टाइप-44, पूसा वैसाखी, पी. एस.-7, पी. एस.-16, के-851, एस-8, एस-9, जी-65, एस-12, शीला आदि।


खरीफ ऋतु की मूंग के लिए -


पंत मूंग-1, पंत मूंग-2, पंत मूंग-3, टी-1, मूंग जवाहर, क्रांति टाइप 03, कृष्णा-11, टी-44 आदि।


गर्मियों के लिए -


पंत मूंग-1, पंत मूंग-2 आदि।


छत्तीसगढ़ के लिए मूंग की उपयुक्त किस्में -


के-851, एम.एल.-5, एम.एल.-131, पी.डी.एम.-54, पूसा-16 आदि। छत्तीसगढ़ में मूंग की खरीफ फसल ली जाती है।

मध्यप्रदेश में मूंग की जल्दी पकने वाली किस्में -


जवाहर मूंग-721, पूसा बैसाखी, कृष्णा-11, K-851 आदि ।

मूंग की खेती के लिए आवश्यक भूमि ( soil )


मूंग की खेती लगभग सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती है। लेकिन अच्छे जल-निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी तथा दोमट भूमि इसके लिए सबसे अच्छी रहती है। मूंग की खेती के लिए अम्लीय एवं क्षारीय मृदाऐं उपयुक्त नहीं है।

मूँग की उन्नत खेती के लिए खेत की तैयारी कैसे करें ( field preparation )


ग्रीष्मकालीन बुवाई के लिए रबी की फसल काटने के तुरंत बाद पलेवा कर देना चाहिए‌। खेत में ओठ आने पर एक बार जुताई मिट्टी पलटने वाले हल या हैरो से तथा दूसरी जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करके पाटा लगा देना चाहिए।

खरीफ ऋतु की मूंग के लिए बर्षा के बाद पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा एक-दो जुताईयां देशी हल से करते हैं। उसके बाद पाटा या पटेला चलाकर मिट्टी को भुरभुरा कर देते हैं।

मूँग की उन्नत खेती के लिए बुवाई का समय एवं ढंग ( time of sowing and method )


ग्रीष्मकालीन मूंग को मार्च के प्रथम सप्ताह से लेकर अप्रैल के मध्य तक अवश्य को देना चाहिए। 15 अप्रैल के बाद बोने से उपज में कमी आती है। खरीफ की फसल को 15 जून से 15 जुलाई तक बोया जा सकता है। बसंतकालीन फसल को फरवरी-मार्च में बोते हैं।

बीज को देशी हल अथवा सीड्रिल से 8-10 सेंटीमीटर गहरी कतारों में बोते हैं। ग्रीष्म ऋतु की फसल में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेंटीमीटर तथा पौध से पौध की दूरी 7-10 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। खरीफ की फसल में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 सेंटीमीटर तथा पौध से पौध की दूरी 7-10 सेंटीमीटर रखते हैं। बोने के तुरंत बाद पाटा लगा देते हैं।

बीजोपचार ( Seed treatment ) 


बुवाई से पहले बाविस्टीन या थायरम 3 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से बीजोपचार करने से बीजजन्य तथा भूमिजन्य बीमारियों से बचाव होता है। इसके पश्चात बुवाई के ठीक पहले राइजोबियम कल्चर से उपचार करना चाहिए। एक पैकेट कल्चर एक हेक्टेयर में बोने के लिए बीज की मात्रा के लिए काफी होता है।

मूंग की बीज दर ( seed rate )


ग्रीष्मकालीन व बसन्तकालीन फसल के लिए 25-30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर तथा खरीफ की फसल के लिए 12 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है।

मूँग की उन्नत खेती के लिए आवश्यक खाद एवं उर्वरक ( Manure and Fertilizers )


दलहनी फसल होने के कारण मूंग को कम नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है। लेकिन फिर भी अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए ग्रीष्मकालीन व बसन्तकालीन फसल में 20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर तथा खरीफ की फसल में 15 किलोग्राम नाइट्रोजन तथा 40 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से बोते समय कूँड में डालना चाहिए।

जड़ों में ग्रंथि होने के कारण नाइट्रोजन की कम आवश्यकता पड़ती है। मृदा में उर्वरक मृदा परीक्षण कराने के बाद ही डालना चाहिए। यदि किसानों के पास जैविक खाद हो तो और ही अच्छा रहेगा। जैविक खाद डालने से उपज में वृद्धि होती है।मूंग की खेती के लिए खेतों में दो-तीन वर्षों में कम से कम 5 से 10 टन गोबर या कंपोस्ट खाद देनी चाहिए।

सिंचाई की आवश्यकता ( Irrigation )


ग्रीष्मकालीन व बसंतकालीन मूंग में पहली सिंचाई बुवाई के 30-32 दिन बाद तथा फिर 10-12 दिन के अंतर पर तीन से चार सिंचाई करनी चाहिए। खरीफ की फसल में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन फिर भी यदि बरसात न हो तो फलियां आते समय एक दो सिंचाई कर देनी चाहिए।


मूंग की फसल में खरपतवार प्रबन्धन करना ( Weed Management )


मूंग के पौधे की अच्छी बढ़वार के लिए पहली निराई गुड़ाई सिंचाई के बाद तथा खरीफ की फसल में 20-25 दिन बाद निराई करनी चाहिए। इसके बाद यदि खेत में खरपतवार अधिक हो तो दूसरी निराई गुड़ाई 40 दिन के अंतर पर करनी चाहिए या फ्लूक्लोरैलिन 45 E.C. नामक रसायन की 1.5 लीटर मात्रा को आवश्यक पानी में मिलाकर बुवाई के दो-तीन दिन बाद प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़क देना चाहिए।

फसल चक्र ( Crop rotation )


अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए एवं भूमि की उर्वरा शक्ति बनाए रखने के लिए उचित फसल चक्र अपनाना चाहिए। जो निम्न है -

1. मूंग-आलू
2. बाजरा-गेहूं-मूंग
3. ज्वार-आलू-मूंग
4. धान-गेहूं-मूंग
5. बाजरा-लाही-गेहूं-मूंग

मूंग की फसल में लगने वाली बीमारियां ( Diseases of green gram )


1. पीला चित्रवर्ण रोग ( Yellow patch disease )


इस रोग के कारण पत्तियों पर पीले सुनहरे चकत्ते पाए जाते हैं। उग्र अवस्था में पूरी पत्ती पीली पड़ जाती है। इसकी रोकथाम के लिए डायमिथोएट 30 E.C. को 1 लीटर प्रति हेक्टेयर या मिथाइल-ओ-डिमिटान 25 E.C. को 1 लीटर प्रति हेक्टेयर पानी की उपयुक्त मात्रा मिलाकर छिड़कनी चाहिए।

2. पत्तियों का धब्बा रोग ( Leaf spot disease )


इस रोग में पत्तियों पर गोलाई लिए हुए कोणीय धब्बे बन जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए 2 किलोग्राम जिंक मैग्नीज कार्बोमेट या 500 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।


3. चीती जीवाणु रोग


इस रोग में पौधों की पत्तियों, तनों, फलियों पर छोटे गहरे भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। इस रोग की रोकथाम के लिए  एग्रीमाइसीन 200 ग्राम या स्टेप्टोसाईक्लीन 50 ग्राम को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़कना चाहिए।

मूंग की फसल में लगने वाले कीट ( Insects of green gram )


1. फली छेदक ( Pod borer )


इस कीट की सुण्डी फलियों में दाना पडते समय फली में छेद करके दाने को खाते हैं। इस कीट की रोकथाम के लिए इण्डोसल्फान 35 E.C. 1.25 लीटर प्रति हेक्टेयर 1,000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।


2. दीमक ( Termite )


यह कीट पौधों की जड़ों को खाकर पौधे को नुकसान पहुंचाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए बुवाई से पहले अंतिम जुताई के समय खेत में क्यूनालफोस 1.5 प्रतिशत या क्लोरोपैरिफॉस पाउडर की 20-25 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिला देनी चाहिए।

3. माहो, सफेद मक्खी, जैसिड, टिड्डा आदि की रोकथाम के लिए 25 किलोग्राम एल्ड्रिन या हैप्टाक्लोर की धूल 5% का पौधों पर भुरकाव अवश्य करना चाहिए।

मूंग की फसल की कटाई ( Harvesting )


मूंग की कटाई ग्रीष्मकालीन व बसन्तकालीन में जब 50% फलियां पक जाए तब पहली तुडाई कर लेनी चाहिए। दूसरी बार जब संपूर्ण फलियां पक जाने पर फसल को काट लेना चाहिए तथा खलियान में लाने पर थोड़ा सुखाकर बैलों की दाएं चलाकर दाना भूसा अलग कर लेते हैं

उपज ( Yield )


ग्रीष्म व  बसंतकालीन मूंग से 10-12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा खरीफ की फसल से 8-10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है।


मूँग की खेती से मिलते-जुलते कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर


प्रश्न 1. खरीफ की फसल हेतु मूँग का बीजदर कितना होता है?

उत्तर - खरीफ की फसल हेतु मूँग का बीजदर 12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है।

प्रश्न 2. मूँग की शीघ्र पकने वाली उन्नतशील जातियां कौन-कौन सी हैं?

उत्तर - मूँग की शीघ्र पकने वाली उन्नतशील जातियां -


1. पूसा बैसाखी = 60 - 70 दिन

2. टाइप - 44 = 60 - 70 दिन

3. के. 851 = 60 - 65 दिन

4. पन्त मूँग-1 = ग्रीष्म ऋतु में 65 दिन तथा खरीफ में 75 दिन

5. PDM-54 ( मोती ) = 60 - 65 दिन

6. पूसा विशाल = 62 दिन

7. HUM-12 = 60 - 65 दिन

8. पन्त मूँग-6 = 60 - 65 दिन

प्रश्न 3. मूँग के उपयोग लिखिए?

उत्तर - मूँग के उपयोग -


1. मूँग का उपयोग नमकीन तथा मिठाई बनाने में किया जाता है।

2. मूँग का उपयोग पापड़ तथा मगोड़ी बनाने में भी किया जाता है।

3. मूंग की हरी फलियां सब्जी के रूप में भी उपयोग की जाती हैं।

4. मूंग की फसल को हरी खाद तथा पशुओं के हरे चारे के लिए भी प्रयोग किया जाता है।

5. मूँग के बीजों का उपयोग दाल के रूप में किया जाता है।

प्रश्न 4. मूँग की फसल से अधिक उत्पादन लेने के लिए आवश्यक बातें क्या है?

उत्तर - मूँग की फसल से अधिक उत्पादन लेने के लिए आवश्यक बातें -


1. समय पर मूँग की बुवाई करनी चाहिए।

2. फसल में उचित खाद एवं उर्वरक की मात्रा समय-समय पर देनी चाहिए।

3. फसलों की खरपतवारों से रक्षा करने के लिए खेतों में समय-समय पर निराई-गुड़ाई तथा रसायनों का छिड़काव करना चाहिए।

4. आवश्यकता पड़ने पर समय-समय पर सिंचाई करनी चाहिए।

5. फसल को हमेशा रोगों एवं कीटों से बचाकर रखना चाहिए। इसके लिए फसलों में समय-समय पर रसायनों का छिड़काव करना चाहिए।

6. उचित फसल-चक्र को अपनाना चाहिए।

7. हमेशा अधिक पैदावार देने वाली उन्नतशील जातियां को बोना चाहिए।

इस प्रकार हम फसल से अधिक पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।

प्रश्न 5. मूँग के दानों का भण्डारण कब और कैसे करें?

उत्तर - मूँग के दानों का भण्डारण करने से पहले दानों को अच्छी तरह से धूप में सुखा लेना चाहिए। जब दानों में नमी 10% रह जाए, तभी दानों का भण्डारण करना चाहिए।

मूँग के दानों का भण्डारण जब फसल की कटाई-मडाई-ओसाई हो जाती है, उसके बाद दानों को धूप में सुखा लेने के बाद करते हैं।

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