उड़द या उर्द की उन्नत खेती कैसे करें

उड़द या उर्द की उन्नत खेती कैसे करें cultivation of Black Gram in hindi


उड़द एक महत्वपूर्ण दलहनी फसल है। भारत में इसका उपयोग मुख्य रूप से दाल के रूप में किया जाता है। उड़द में अन्य दालों की अपेक्षा फास्फोरस की प्रचुर मात्रा होने के कारण इसकी उपयोगिता अधिक है।

इसमें 24% प्रोटीन, 1.3% वसा एवं 64.4% कार्बोहाइड्रेट पाई जाती है। उड़द की दाल को पीसकर इससे पापड़, इमरती, लड्डू आदि बनाए जाते हैं। चावल के आटे के साथ मिलाकर इससे इडली, डोसा आदि बनाए जाते हैं।

हरी खाद बनाने के लिए तथा भू-क्षरण को रोकने के लिए इसकी फसल मुख्य रूप से उगाई जाती है। दाल की भूसी पशुओं के खाने के काम आती है। दलहनी फसल होने के कारण इसके पौधों की जड़ों में गांठें या ग्रंथियां पाई जाती हैं,

जिनसे भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में मदद मिलती है, क्योंकि इन गांठों में बैक्टीरिया, राइजोबियम, फैसिलोआई पाए जाते हैं, जो वायुमंडलीय नत्रजन को एकत्रित करते हैं। इस प्रकार उड़द एक महत्वपूर्ण दलहनी फसल है।


उड़द या उर्द की खेती Black Gram

उड़द की खेती का वानस्पतिक वर्गीकरण


वानस्पतिक नाम ( Botanical Name )

विग्ना मुन्गो ( Vigna Mungo L. Hepper )

कुल ( Family )

फेबेएसी ( Fabaceae )

गुणसूत्र संख्या 

2n = 22 या 24


उड़द का उत्पत्ति स्थान ( Origin of Urad )

उड़द का उत्पत्ति स्थान भारत को ही माना जाता है क्योंकि हमारे यहां प्राचीनकाल से ही उड़द की खेती होती चली आ रही है।

उड़द का क्षेत्रफल एवं वितरण (Area and Distribution of black gram )

भारत में लगभग 31.50 मि. हेक्टेयर भूमि में उड़द की खेती की जाती है। इसका उत्पादन 1.4 मिलियन टन है।
इसकी औसत उत्पादकता 4.73 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।
चना एवं अरहर के बाद देश की प्रमुख दलहनी फसल उड़द ही है।

इसके मुख्य उत्पादक क्षेत्र मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, पंजाब, असम, राजस्थान है। देश की लगभग 50% उड़द मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र में पैदा होती है।

उड़द की खेती के लिए आवश्यक जलवायु ( Climate required for urad cultivation )

उड़द के लिए गर्म एवं नम जलवायु उपयुक्त मानी जाती है।
उड़द की फसल के लिए 75-90 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र उपयुक्त हैं। मध्यप्रदेश में उड़द को बसंतकालीन, ग्रीष्मकालीन व वर्षा ऋतु में उगाया जाता है।

फूल आते समय भारी वर्षा से अधिक हानि होती है। पौधे की अधिक वृद्धि के लिए 24°C से 32°C तापक्रम उपयुक्त रहता है। इस तापक्रम में पौधे अच्छी वृद्धि एवं विकास करते हैं।अधिक जलभराव वाले स्थानों पर उड़द की खेती नहीं करनी चाहिए।


उड़द की उन्नतशील किस्में ( Improved varieties of black gram )

अलग-अलग राज्यों के लिए उड़द की उन्नतशील किस्में इस प्रकार हैं -

उत्तर प्रदेश - टाइप-9, टाइप-27, टाइप-65, पंत यू-19

मध्य प्रदेश - ग्वालियर-2, टाइप-9, पंत यू-30, उज्जैन-4, पूसा-1, खरगांव-3, पी.डी.यू.-1
मोजाइक रोग निरोधक किस्में - जे.यू.-3, पी.डी.यू.-1

बिहार - नवीन, वी.आर. 68 ,टाइप -9

राजस्थान - कृष्णा

हरियाणा - मैश 1-1, टाइप -9, यू. जी. 218

दिल्ली -  यू. जी. 218

पंजाब -  यू. जी. 218

गुजरात - ए 46-5, टाइप -9, पंत यू-30

महाराष्ट्र - सिन्ध हरा 1-1, नं. 55, टाइप -9, पंत यू-30

कर्नाटक - खरगांव-3, टाइप -9

आंध्र प्रदेश - एल 53-5, टाइप -9, पंत यू-30

तमिलनाडु - एडीटी-1, सीओ-1, सीओ-2, के. एम. 1, के. एम. 2

पश्चिम बंगाल - बी. 76, टाइप -9

असम - टाइप-122, टाइप-27

YMV रोग निरोधक जातियां - पंत U-19, पंत U-30, PDU-1, UG-218

उड़द की खेती के लिए आवश्यक भूमि ( land required for urad cultivation)

उड़द की खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट एवं दोमट भूमियां उपयुक्त होती हैं। इसकी खेती के लिए अम्लीय एवं क्षारीय मृदाऐं उपयुक्त नहीं होती हैं। मृदा का पी एच 4.7 से 7.5 उपयुक्त होता है। ऐसी मृदाओं में उड़द की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।


उड़द की खेती के लिए खेत की तैयारी करना ( Preparing the field for urad cultivation )

खेत की पहली जोताई मिट्टी पलटने वाले हल से की जाती है। इसके बाद दो-तीन जोताईयां देशी हल या कल्टीवेटर से की जाती है। इसके बाद पाटा या पटेला चलाकर खेत को समतल बना लिया जाता है। इससे खेत पूरी तरह तैयार हो जाता है।

उड़द की खेती करने के लिए बुवाई का सही समय एवं बुवाई की विधि ( The right time and method of sowing for urad cultivation )

उड़द की बुवाई के मुख्य दो समय हैं, जैसे -


(1) मार्च-अप्रैल में गन्ना, आलू, सरसों, गेहूं आदि के खाली पड़े खेतों में ग्रीष्मकालीन फसल ली जाती है।

(2) जुलाई-अगस्त में वर्षाकालीन फसल बोई जाती है।

(3) रवि की फसल की बुवाई 15 सितंबर से 15 नवंबर तक की जा सकती है।

बुवाई हल के पीछे कूँडों में की जानी चाहिए। कूँड से कूँड की दूरी 30 से 45 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर होनी चाहिए। जायद की बुवाई 20 से 25 सेंटीमीटर की दूरी पर करनी चाहिए। लेकिन हमारे यहां पर छिड़काव विधि द्वारा वुबाई अधिक होती है।

उड़द की खेती के लिए बीज दर ( seed rate in hindi )

खरीफ में उड़द का बीज 12 से 15 किलोग्राम, रवि में 15 से 20 किलोग्राम तथा जायद में 20 से 25 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए।

बीजोपचार करना ( Seed treatment )

बीजों को बोने से पहले थायरम,केपटान अथवा बाविस्टीन 3 ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजों को उपचारित करना चाहिए। इसके पश्चात बुवाई के ठीक पहले राइजोबियम कल्चर से बीज को उपचारित करना चाहिए।

एक पैकेट कल्चर एक हेक्टेयर में बोने के लिए बीज की मात्रा के लिए पर्याप्त होता है। बीजों को उपचारित करके बोने से पौधों में रोग नहीं लगते हैं जिससे पौधों की वृद्धि एवं विकास अच्छा होता है।

उड़द की खेती के लिए आवश्यक खाद एवं उर्वरक ( manure and fertilizers )

उड़द एक दलहनी फसल होने के कारण इसको कम नत्रजन की आवश्यकता होती है। लेकिन फिर भी 15 से 20 किलोग्राम नत्रजन, 30 से 40 किलोग्राम फास्फोरस तथा 30 से 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देते हैं।

उर्वरकों की मात्रा मृदा परीक्षण कराने के बाद ही देना चाहिए। अधिकतर डी.ए.पी. द्वारा इन मात्राओं को देते हैं, जिसकी प्रति हेक्टेयर मात्रा लगभग एक क्विंटल पर्याप्त रहती है।

उड़द की खेती के लिए आवश्यक सिंचाई ( irrigation )

आमतौर पर खरीफ वाली फसल में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन फिर भी यदि वर्षा नहीं होती है तो फलियां बनते समय एक सिंचाई कर देनी चाहिए। जायद वाली फसल में 3-4 सिंचाईयों की आवश्यकता होती है।

जायद की फसल में प्रत्येक सिंचाई 15 - 15 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए। पौधों में पुष्प आते समय तथा फलियां बनते समय खेतों में नमी होना अति आवश्यक है, यदि इस समय खेतों में नमी ना हो तो सिंचाई कर देनी चाहिए।

उचित जल-निकास की व्यवस्था करना

वर्षा ऋतु में अधिक पानी बरसने के कारण खेतों में कहीं-कहीं पर पानी भर जाता है। जिसके कारण उस स्थान के पौधे या तो मर जाते हैं या उनकी जड़ें तथा तना खराब हो जाती है। अतः वर्षा ऋतु में हमें इस जमा हुये फालतू पानी को खेत से बाहर निकालने की उचित व्यवस्था बनानी चाहिए। 

जिन क्षेत्रों में अधिक वर्षा होती है उन क्षेत्रों में उड़द की खेती को मेड़ों पर करना अधिक लाभदायक होता है। ताकि मेड़ों के बीच में बनी नालियों द्वारा जमा हुए फालतू पानी का उचित जल-निकास हो सके। जल-निकास से मृदा में वायु का संचार भी बढ़ता है। जिससे पौधे अच्छी ग्रोथ करते हैं।

अतः हमें बरसात के दिनों में खेतों में जमा हुए फालतू पानी को बाहर निकालने के लिए उचित जल निकास की व्यवस्था करनी चाहिए। इसके लिए खेतों में हमें नालियां बनानी चाहिए।

उड़द की फसल में खरपतवार प्रबन्ध करना  ( weeds management )

खरपतवारों की रोकथाम के लिए वुबाई के 25 से 30 दिन बाद निराई - गुड़ाई करनी चाहिए। आवश्यकतानुसार दूसरी निराई - गुड़ाई 40 से 45 दिन बाद करनी चाहिए।

घास तथा चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को रासायनिक विधि से नष्ट करने के लिए फ्लूक्लोरैलिन नामक खरपतवारनाशी की 1.5 लीटर दवा को आवश्यक पानी में मिलाकर बुवाई के दो से तीन दिन बाद प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि पर छिड़कनी चाहिए। इससे खरपतवार नष्ट हो जाते हैं।

उड़द की मिश्रित खेती करना

बरसात के दिनों में हम उर्द की खेती को अन्य फसलों के साथ भी आसानी से उगा सकते हैं। वर्षा ऋतु में उर्द की खेती को हम मुख्यत: ज्वार, मक्का, बाजरा, कपास व अरहर आदि के साथ आसानी से उगा सकते हैं। मिश्रित खेती करने से हमें एक ही स्थान से कई प्रकार की फसलें प्राप्त हो जाती है।

उचित फसल चक्र ( crop rotation )

ज्वार-गेहूं-उड़द ( ग्रीष्मकालीन )

मक्का-तोरिया-उड़द ( बसंतकालीन )

मक्का-आलू-उड़द ( बसंतकालीन )

धान-गेहूं-उड़द ( ग्रीष्मकालीन )

बाजरा-चना-उड़द ( ग्रीष्मकालीन )

उड़द(खरीद)-गेंहूं-मूंग

उड़द-चना

उड़द की फसल में लगने वाली बीमारियां ( Diseases )


(1) पीला चित्रवर्ण रोग ( yellow patch disease )


यह एक बीज जनित रोग है जो वायरस से द्वारा होता है। रोग का प्रसारण सफेद मक्खी जैसे चूसक कीड़ों द्वारा होता है। पत्तियों की नसें तथा उनके किनारे की कोशिकाऐं पीली पड़ जाती हैं।

रोग की उग्र अवस्था में संपूर्ण पत्ती पीली पड़ जाती है। इसकी रोकथाम के लिए डाईमिथोएट 30 ई. सी. प्रति लीटर प्रति हेक्टेयर या फास्फोमिडान 200 से 300 मिली प्रति हेक्टेयर की दर से उपयुक्त पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

रोगी पौधों को जमीन से उखाड़कर जला देना चाहिए। इसके अलावा रोग प्रतिरोधी जातियां जैसे - पंत यू-26, पूसा-1 उगाना चाहिए।

पीला मोजैक रोग


(2) उड़द का पत्र-दाग ( Leaf spot )


इस रोग में पत्तियों पर गोलाई लिए हुए भूरे रंग के कोणीय धब्बे दिखाई देते हैं, जिनमें बीच का भाग है राख या हल्का भूरा तथा किनारा लाल बैगनी रंग लिए हुए होता है।

इस रोग की रोकथाम हेतु 2 किलोग्राम जिंक-मैंगनीज कार्बामेट का छिड़काव प्रति हेक्टेयर की दर से उपयुक्त पानी में घोलकर करना चाहिए।

(3) लीफ कर्ल रोग ( Leaf curl desease )


इसमें पत्ती का मुख्य शिरा तथा किनारे के करीब की क्लोरोफिल नष्ट हो जाती है। इस रोग में पत्तियां मुड़ जाती है। इस रोग की रोकथाम के लिए रोगी पौधों को नष्ट कर देना चाहिए। स्वस्थ बीज का प्रयोग करना चाहिए तथा रोग प्रतिरोधी किसने बोनी चाहिए।

उड़द की फसल में लगने वाले कीट ( Insects )


(1) कमला कीट 


यह कीट रोमिल गिडार होता है, जो पत्तियों को खाकर पौधों को ठूँठ बना देता है। इसकी रोकथाम के लिए 2% मिथाइल पैराथकयान चूर्ण की 25 से 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करना चाहिए।

(2) फली भेदक


इस कीट की सुण्डियां फलियों में छेद करके उसके अंदर बनने वाले दानों को खाती है। इसकी रोकथाम के लिए एंडोसल्फान 35 ई. सी. 1.25 लीटर प्रति हेक्टेयर का छिड़काव या कार्बराइल 50% घुलनशील चूर्ण 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़कना चाहिए।

इसके अतिरिक्त पौधों को भूमि से काटने वाले कीट जैसे - दीमक, डिम्भक, झींगुर आदि को नष्ट करने के लिए 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से एल्ड्रिन का प्रयोग करना चाहिए।

उड़द की फसल की कटाई  ( Harvesting )


जब फसल की अधिकांश फलियां काले रंग की हो जाएं, फसल की कटाई कर लेनी चाहिए। दो बार में फली तोड़ने वाली किस्म में जब 50 से 75% फलियां पक जाएं तब पहली तुडाई करनी चाहिए।

शेष 25 से 50% बाद वाली फलियां पकने पर फसल काट लेनी चाहिए। फलियों सहित काटी गई फसल की लाँक को खलियान में डालकर सुखा लेना चाहिए। बाद में सूखे लाँक को बैलों की दाँय चलाकर दाना व भूसा अलग कर देते हैं
इसका भूसा पशु बड़े ही चाव से खाते हैं।

उपज ( Yield )

खरीफ की फसल से 10 से 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा जायद की फसल से 12 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त हो जाती है।

उड़द या उर्द की उन्नत खेती कैसे करें से मिलते-जुलते कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर


प्रश्न 1. उड़द की बुवाई करने के लिए प्रति हेक्टेयर बीजदर कितना पर्याप्त होता है?

उत्तर - उड़द की बुवाई करने के लिए प्रति हेक्टेयर खरीफ में 12 से 15 किलोग्राम, रबी में 15 से 20 किलोग्राम तथा जायद में 20 से 25 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है।

प्रश्न 2. उड़द में राइजोबियम की कौन सी जाति पाई जाती है?

उत्तर - उड़द में राइजोबियम की फैसियोलाई जाति पाई जाती है।

प्रश्न 3. उड़द का उत्पत्ति स्थान कहां पर है?

उत्तर - उड़द का उत्पत्ति स्थान भारत ही है।

प्रश्न 4. उड़द की खेती कब की जाती है?

उत्तर - उड़द की खेती खरीफ, रबी, जायद तीनों मौसम में आसानी से की जाती है।

प्रश्न 5. उड़द की फसल कितने दिन की होती है?

उत्तर - उड़द की फसल उसकी किस्मों पर निर्भर करती है कि वह कितने दिन की फसल है। लेकिन उड़द की अधिकांश जातियां 80 से 90 दिन में पकपक तैयार हो जाती है। अतः उड़द की फसल 80 से 90 दिन की होती है।

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